31 दिसंबर 2010

कांग्रेसी सरकार (क्षणिकाऐं)

क्षणिकाऐं

1
डी राजा

मनमोहन, सोनीया औ करूणा की निधी है राजा?
गैर सरकारी खजाने को भरने की विधी है राजा?

2
प्रणव मुखर्जी

मैडम जी
विपक्ष से संसद नहीं चलने पर माफी मंगवाना है

क्योंकि
मैडम

उल्टे चोर के कोतवाल को डांटने का जमाना है!

3
कांग्रेसी सरकार

आर्दश, स्पेक्टरम और कॉमनबेल्थ
घोटालों की बैंड बजाएगें,

आतंकवाद को धर्म की चासनी में डुबो
चाव से चवाएगें।

ज्यादा चूं चपड़ किया तो
तुमको भी इसमें फंसाएगे।

30 दिसंबर 2010

शेखपुरा.... चोरी का नायब तरीका पहले दोस्ती फिर अपने को अधिकारी बना अपनी गाड़ी में बैठा का लूटते है। अर्न्तराज्यीय गिरोह का तीन शातीर घराया। नशाखुरानी पर कसे सिंकजे पर शातीर ने अपना नायब तरीका अल्टो गाड़ी से देते है लूट को अंजाम।

इस चेहरे को ध्यान से पहचान लिजिए। गौर से देखिए। जेनटल मैन दिखने वाले ये लोग शातीर चोर है और कहीं भी  आपसे दोस्ती गांठ कर आपको लूट सकते है।

सावधान हो जाइए

बैंक अधिकारी बन  आपको घर तक अल्टो से छोड़ने का का झांसा देकर बनाता है लूट का शिकार।

जी हां जिले में लूट का शिकार बनाने का एक नया तरीका सामने आया है। ऐस तरीका जिसमें पहले रेलयात्री बन रणजीत कुमार पहले लक्खीसराय निवासी इंद्रदेव  तांती से दोस्ती की फिर उसे बताया कि शेखपुरा की सभी सड़क का जाम कर दिया गया है और इसका कारण बताया की कुख्यात शातीर अपराधी अशोक महतो के द्वारा पुलिस जीप को फुंक दिया गया है जिससे ऐसा हुआ है। फिर जब इंद्रदेव घर की समस्या बताता है तो रणजीत कहता है  िकवह एक बैंक अधिकारी है और वह भी उसी तरफ जा रहा है जिधर उसका घर है और उसको लेने के लिए उसके दोस्त अल्टो गाड़ी से आये हुए है। फिर क्या था उजैन से कमाई कर लौट रहे इंद्रदेव उसके साथ अल्टो गाड़ी पर सवार हो गया। फिर रणजीत उससे कहता है कि उसके बैग में पैंतिस हजार रूप्या हे और उसे वह बैंक में ही जमा कराने जा रहा है और इसके बाद इंद्रदेव ने भी बता दिया कि उसके सुटकेस में 9000 रू. है और फिर थोड़ी देर में अल्टो गाड़ी को रोका गया और इंद्रदेव को थोड़ी देर के लिए उतर जाने के लिए कहा गया और साथ ही उसे अपना बैग जिसमें 35000 रू. रखा था उसे रखने के लिए दिया और उसकी अटैची गाड़ी में रखा और फिर गाड़ी बढ़ा दी।

और फिर जब इंद्रदेव में बैग खोल कर देखा तो उसमें बेकार कपड़े थे। फिर उसे लूट जाने का एहसास हुआ तथा फिर चिल्लाना शुरू किया और इसी क्रम में स्थानीय लोगों की पहल पर रास्ते में पड़ने वाली सिरारी ओपी पुलिस को इसकी सूचना दी और रास्ते में चोर गिरोह को पकड़ा गया।

मामले में बक्तीयारपुर निवासी रणजीत कुमार, तथा वहीं का कपील पासवान एवं बाढ़ निवासी चालक रवि पासवान को गिरफ्तार किया गया।

गिरफ्तार चोरों ने इस तरह के नायाब चोरी की बात स्वीकार की तथा कहा कि वह घूम घूम कर इसी तरह से लोगों को दोस्ती कर फंसाता है और उसे लूटता है। वे लोग बिहार के कई जिलों से लेकर उत्तर प्रदेष के कई रेलवे स्टेशन पर इस घटना को अंजाम देता है। यह लोग ऋसीकेष में भी एक बार इस तरह के मामले में पकड़ा जा चुका है और जमानत पर छूट कर फिर दूसरी जगह इस तरह का काम करता है। 

ये लोग इतने शातीर है कि एक जगह एक से दो बार ही इस तरह की घटना को अंजाम देते है।

शानदार अल्टो गाड़ी से लूट को अंजाम देने वालों ने बताया कि पहले नशाखुरानी का काम करते थे पर आब उसमें कड़ाई हो गई है तो इस तरह की नायाब चोरी करता है।

चिकित्सा जगत के लिये अजुबा बना है। युवक के ऑखों से निकल रहा है कीड़ा। रिसर्च के लिये वीरायतन एवं पटना आर्युविज्ञान संस्थान भेजा गया।

शेखपुरा जिले के करिहो गॉव निवासी 28 वर्षीय युवक नंदेलाल यादव के ऑखों की बॉये पुतली से लगातार कीड़ा निकल रहा है। जिससे ऑखों के चिकित्सक इस अजीबो-गरीब घटना से भी आश्चर्य चकित है। यह वाक्या शहर के जमालपुर रोड स्थित जीवन-ज्योति ऑख अस्पताल में इलाज के  भर्ती हुए मरीज नंदेलाल के साथ घटित हुआ है। जिससे इलाज के लिए भरती हुआ मरीज सहमें है। पिछले 12 घंटों के दरम्यान जीवन ज्योति ऑख अस्पताल के आई स्पेस्लिस्ट डा0 राकेश रंजन अब तक 40 कीड़े निकाल  चुके है। इस बाबत ऑख अस्पताल में ईलाज करा रहे युवक ने बताया कि वह मजदूरी कर अपनी पत्नी और बच्चों का पेट पाल रहा है। पिछले छहमाह से बॉये ऑख में खुजली होती थी। तब ऑखों को हाथ से ही रगड़कर ठीक कर लेता था। बीच में जब कभी खुजलाहट होती थी तो दवा दूकानदार से पूछकर आई ड्राप ले लेता था।

    मंगलवार की संध्या जब ऑखों की जलन बढ़ी तो अस्पताल में आये। अलग-अलग जॉच के बाद उसके ऑख में बड़ी तादाद में कीड़ा पाया गया। नंदेलाला ने बताया कि अब तक डाक्टर द्वारा उसके ऑख से 40 जीवित कीड़ा निकाला जा चुका है। अब डाक्टर साहब द्वारा बेहतर ईलाज के लिए विरायतन भेजा जा रहा है। इस बाबत नंदेलाल की ऑख की इलाज कर रहे डा0 राकेश रंजन सने बताया कि नंदेलाल द्वारा गंदे पदार्थ का भोजन करने के कारण उसके शरीर में कीड़ा फैल कर खुन के जरिये ऑखों के स्लेक्टा में जमा हो गया है। उसकी ऑखों से निकल रहे कीड़े शौच के साथ निकलने वाला उजला कीड़ा है। लेकिन नंदेलाल के ऑखों तक पहुॅचना अजीबोगरीब वाक्या है। इसके रिसर्च के लिए वीरायतन या पटना आयुर्विज्ञान संस्थान भेजा सजा रहा है। डा0 राकेश रंजन ने बताया कि नंदेलाल को फिलहाल बीटाडीन आई ड्राप, मैक्सी टेबलेट एवं प्रोक्साडीन दवा दिया गया है। जिससे निकल रहा कीड़ा मरा हुआ निकल रहा है।  

27 दिसंबर 2010

वृद्धापेंशन की राशि निकासने गये वृद्ध हो रहे ठगी का शिकार...... 10 रू. में बिक रहा निकासी फॉर्म

बरबीघा पोस्ट ऑफिस में असहायों को मिलने वाली सरकारी सहायता राशि को भी लूटने में कई लोग लग जाते है और इसमें पोस्ट मास्टर का भी सहयोग होता है। बड़े ही शातिराना तरीके पोस्ट आफिस के द्वारा इस खेल को अंजाम दिया जा रहा है। बृद्धापेंशन की राशि निकालने जब बृद्ध लोग आते है तो उन्हें निकासी फॉर्म नहीं दिया जाता है और निकासी फॉर्म पोस्ट आफिस के बगल में ही एक पान दुकान में बिकता है। निकासी फॉर्म के बदले पान दुकानदार सभी बृद्ध लोगों से प्रति पास बुक बीस से दस रू. बसूलता है। लाचर और बेबस लोगों की मदद करने तो कोई आगे नहीं आता है पर उसके पैसे को ऐंठने का तरह तरह का तरीका निकाल लिया जाता है। इतना ही नहीं पोस्ट ऑफिस का पास बुक भर कर पान दुकान में ही जमा हो जाता है और दो दिन बाद पैसा लेने के लिए आने की बात कही जाती है। पान दुकानदार ही नहीं कई अन्य लोग भी कैंप्स के अंदर दस दस रू. बसूल कर लाचार बुढ़े लोगों से निकासी फार्म के नाम पर उगाही करते है।


इस संबंध में नाराणपुर निवासी श्रीदेवी नामक बृद्धा महिला इस 10 रू. के लिए बेचारगी दर्शाते हुए कहती है कि वह कर्जा ला कर 20 रू. दिया है। भला सोचिए सरकार ने जिस बेबसी को ध्यान में रख कर बुजूर्गो को मदद के लिए 200 प्रति माह की राशि वृद्धापेंशन के रूप में दी है उसमें भी बसूली मानवीय संवेदना को झकझोरने वाला कदम है कि नहीं।

हलांकि इस संबंध में पोस्ट मास्टर श्रवण सिंह ने कहा कि उनको इसकी जानकारी नहीं है और ऐसा किया जा रहा है तो इसपर कार्यवाई होगी। इसी संबंध में जब जिला डाक निरीक्षक सें संपर्क किया गया तो उन्होने जांच कर इसपर कार्यवाई की बात कही।

25 दिसंबर 2010

विनायक सेन को समर्पित मेरी कविता (राजद्रोह)











राजद्रोह है 
हक की बात करना।


राजद्रोह है
गरीबों की आवाज बनाना।


खामोश रहो अब
चुपचाप
जब कोई मर जाय भूख से 
या पुलिस की गोली से
खामोश रहो।


अब दूर किसी झोपड़ी में
किसी के रोने की आवाज मत सूनना
चुप रहो अब।


बर्दास्त नहीं होता
तो
मार दो जमीर को
कानों में डाल लो पिघला कर शीशा।


मत बोलो 
राजा ने कैसे करोड़ों मुंह का निवाला कैसे छीना,
क्या किया कलमाड़ी ने।


मत बोला, 
कैसे भूख से मरता है आदमी
और कैसे
गोदामों में सड़ती है अनाज।


मत बोलो,
अफजल और कसाब के बारे में।
और यह भी की 
किसने मारा आजाद को।


वरना


विनायक सेन
और 
सान्याल की तरह
तुम भी साबित हो जाओगे 
राजद्रोही


राजद्रोही।




पर एक बात है।
अब हम
आन शान सू 
और लूयी जियाबाओ 
को लेकर दूसरों की तरफ
उंगली नहीं उठा सकेगें।

22 दिसंबर 2010

शाकाहारी गिद्ध

आज कल घरती पर उड़ने वाले गिद्ध
हर जगह रहते है।
आज ही तो
आइसक्रीम बेच रहे नन्हें चुहवा पर
चलाया था ``चंगुरा´´
गाल पर पंजे का निशान उग आये
कांंग्रेस पार्टी की सेम्बुल की तरह
बक्क!
आंखों में भर आया
``लाल लहू´´,
पर,
निरर्थक,
वाम आन्दोलनों की तरह।

कल ही रेलगाड़ी में भुंजा बेच रहे मल्हूआ पर
खाकी गिद्ध ने मारा झपट्टा,
बचने के प्रयास में आ गया वह पहिये के नीचे,
सैकड़ों हिस्सों में बंट गया मल्हूआ,
शाकाहारी गिद्धों के हिस्से आया एक एक टुकड़ा।

अब तो हर जगह दिखाई देते है गिद्ध,
कहीं भगवा,
तो
कहीं जेहादी बन कर
टांग देते है अपनी कथित धर्म की धोती खोलकर
अपने ही बहन-बेटी के माथे पर
और फिर नोच लेते है उसकी देह
भूखे गिद्धों की तरह।

गांव से लेकर शहर तक पाये जाते है
शाकाहारी गिद्ध...।

18 दिसंबर 2010

हिन्दु-मुस्लिम साथ-साथ मनाते है मोहर्रम। साथ सजाते हैं ताजीया। साथ खेलते है लाठी।



राजनीतिक पूर्वाग्रह से दूर गॉवों में आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता और सौहार्द की मिशाल देखने को मिल जाती है। ऐसा ही सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक बन कर सामने आता है मोहर्रम का  त्योहार ब्रहमपुरा गॉव में। इस गॉव हिन्दुओं द्वारा चंदा दिया जाता है और मिलजुल कर तजीया (सीपल) सजाया जाता है और फिर साथ-साथ मिलकर मुहर्रम जुलूस में या अली, या अली के नारों के बीच लाठियॉ खेली जाती है।

ब्रहमपुरा गॉव के महावीर चौधरी, नवल पासवान, मो0 अनवर, मो0 फेकू सहित कई अन्य लोग आज मोहर्रम जूलूस में साथ-साथ लाठी खेल रहें हैं। सियारात की चालों से इतर ये लोग सौहार्द और भाईचारे की मिशाल पेश करते हैं। वकौल महाबीर चौधरी उनके पूर्वज ही इस ताजीया को सजाते आ रहे है और यह परम्परा 100 साल से अधिक समय से चली आ रही है। हिन्दूओं द्वारा ताजीया जूलूस निकालने के इस परम्परा के सम्बन्ध में जानकारी देते हुए मो0 मोइज ने बताया कि ब्रहमपुरा में चुंकि मुस्लमानों की संख्या कम है इसलिए गॉव के बुजूर्गों के द्वारा साथ-साथ मोहर्रम मनाने की परम्परा बनी जो आज तक चल रही है।
मो0 अब्बास इसमें किसी प्रकार की बुराई नहीं देखते और उनकी माने तो ईश्वर एक है भले ही पूजा करने की विधि अलग-अलग। ग्रामीण विलास यादव कहते है कि जबसे होश सम्भाला है ताजीया जुलूस में लाठी खेल रहे है अब तो यह लगता ही नहीं कि यह अपना त्योहार नहीं ।
गॉवों की दशकों पुरानी यह परम्परा वीकीलीक्स के खुलासे बाद धर्म की राजनीति करने वालों और आतंकवाद में राजनीति करते हुए उसमें रंग तलाशने वालों के गालों पर एक करारा तमाचा है।

प्रेम की परिभाषा


प्रेम

समर्पण का एक अन्तहीन सिलसिला

आशाओं

आकांक्षाओं

और भविष्य के सपनों को तिरोहित कर

पाना एक एहसास

और तलाशना उसी में अपनी जिन्दगी.....

.

16 दिसंबर 2010

एक मां....





वमुिश्कल अपने मालिक से
आरजू-मिन्नत कर
जुटा पाई अपने बच्चे के लिए 
एक अदद कपड़ा।

मेले में बच्चे की जिदद ने
मां को बना दिया है निष्ठुर।

बच्चे की लाख जिद्द पर भी
नहीं खरीद सकी एक भी खिलौना।

देवी मां की हर प्रतिमा के आगे
हाथ जोड़ 
सालों से कर रही है प्रर्थना 
एक मां.....

14 दिसंबर 2010

पुरानी फाइलों को उलटते कलटते पांच साल पूर्व कागज के टुकड़ों पर लिखे दिल की बात के कुछ पन्ने मिल गए, सोंचा आपसे सांझा कर लूं, पेश है-

इसे संयोग कहे या दुर्योग, आज दो वाक्या एक सा घटी। प्रथम हिंन्दी दैनक ‘‘आज’’ में मेरे द्वारा गेसिंग (जुआ) के अवैध धंधे से संबन्धित समाचार जिसमें हमने बरबीघा नगर पंचायत के प्रतिनिधियों का इस धंधें में संलिप्त रहने की बात उजागर की थी, को लेकर नगर पंचायत अध्यक्ष अजय कुमार द्वारा तिव्र प्रतिरोध दर्ज किया गया और मुकदमा करने से लेकर पत्रकारिता की सीमाओं (उनके द्वारा व्यवस्था का विरोध न करना ही पत्रकारिता है) का ज्ञान भी कराया गया। मैं भी भीर गया बहस हुई।

दूसरा वाकया साहित्यिक पत्रिका पुनर्नावा में हिंदी जगत के प्रमुख हस्ताक्षर और कवि-पत्रकार स्व. नरेन्द्र मोहन की कविता पढ़ी जो निम्नवत थी.....

एक सवाल
जो मेरा मन मुझसे
नित्य पूछता
मुझे ही
जांचता, परखता

वह है-
विवशताओं से बंधी
लट्टू सी धूमती यह बंजर
जिंदगी
है किस काम की?
-यह जिंदगी

कठपुतली?


बहुत देर तक मौन सोचता रहा। कठपुतली? मानवेत्तर गुणों में हो रे चातुर्दिक गिरावट क्या इस बात का द्योतक नहीं कि आज के समाज में जिवित आदमी के लिए स्थान नहीं। सच, विवशताओं में बंधी हर आदमी की जिन्दगी एक बंजर जमीन है। तब प्रश्न यह भी अनुत्तरित रह जाती है कि बंजर जिंदगी भला है किस काम की?

फिर एक और कविता कवि शिवओम अंबर की पढ़ी

अपमानित होकर के भी मुसकाना पड़ता है,
इस वस्ती में राजहंस के वंशज को यारों
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।

स्याह सियासत लिखती है
खाते संधर्षों के,
कोना फटा लिए मिलते हैं
खत आदर्शो के।

सबकुछ जान बूझ कर चुप रज जाना पड़ता है
इस वस्ती में विवश बृहस्पति की मृगछाला को
इन्द्रासन से तालमेल बैठाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।

जुगनू सूरज को प्रकाश का अर्थ बताते है,
यहां दिग्भ्रमित, पंथ-प्रदर्शक माने जाते है।
हर जुलूस में जैकारा बुलवाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।

इस वस्ती में उंचाई मिलती तो है लेकिन
खुद अपनी नजरों में ही गिर जाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।

और फिर उठखड़ा हुआ मैं सतत अपनी चाल में चलने के लिए..... सफर अभी जारी है।

13 दिसंबर 2010

कि फिर आऐगी सुबह

हर सुबह एक नई उम्मीद लाती है

खब्बो से निकाल

हमको जगाती है


अब शाम ढले तो उदास मत होना

उम्मीदों कों सिरहाने रखकर तुम चैन से सोना

कि फिर आऐगी सुबह

हमको जगाऐगी सुबह

रास्ते बताऐगी सुबह

उम्मीदों कें सफर को मंजिल तक पहूंचाऐगी सुबह................. 

12 दिसंबर 2010

कसाब की भाषा बोल रही कांग्रेस के पीछे कहीं पाकिस्तानी साजीश तो नहीं ?


दिग्विजय सिंह का बयान कि हेमंत करकरे को हिंदु आतंकवादियों ने मारा देशद्रोह से कम नहीं। पर दिग्विजय सिंह के इस बयान को उनके व्यक्तिगत बयान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कांग्रेस के द्वारा प्रायोजित है। दग्विजय सिंह के बयान के बाद शहीद हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने यह कह कर साफ कर दिया कि उनके पति को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मारा  और हिंदू संगठनों से इसे जोड़कर देखना पाकिस्तान की मदद करने के समान है।

अब आइये कांग्रेस के कसाब-अफजल प्रेम प्रकरण पर। अफजल गुरू और कसाब कांग्रेसी मेहमान तब है, जबकि उन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। हाल ही में कसाब का यह कहना कि मुंबई हमले में मैं नहीं था और पुलिस ने मुझे झूठा फंसाया है और दग्विजय सिंह का यह बयान कि करकरे को हिन्दू संगठनों ने मारा एक भी भाषा नहीं है?

आखिर क्यों कसाब हमारा मेहमान है और उसके उपर हम 15 लाख प्रतिदिन खर्चते है? 

क्या दग्विजय के मूंह से कांग्रेस कसाब की बोली नहीं बोल रही?


यह महज वोट बैंक की राजनीति नहीं है। यह देशद्रोह है और पाकिस्तान को फायदा पहूंचाने का कांग्रेसी चेहरा साफ दिख रहा है।

अभी हाल ही में पाकिस्तान से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने विकिलिक्स के हवाले से यह खुलासा किया कि भारत पाकिस्तान में आतंकबाद फैला रहा है पर बाद में यह खबर गलत निकली और अखबारों ने माफी मांगी, और यह कांग्रेस के नेता पाकिस्तान के इस साजिश पर मुहर लगाते है की आतंकवाद का पैरोकार भारत है पाकिस्तान नहीं। यह एक बार नहीं हो रहा बल्कि यह सिलसिला लगातार चल रहा है। बाटला हाउस प्रकरण याद किजिए दग्विजय सिंह इस घटना मे मारे गए आतंकी के घर जा कर आंसू पोछते है और यह जताना चाहते है कि इस घटना में शहीद पुलिस इंस्पेक्टर आतंकी था।

कांग्रेस के अल्पसंख्यक मामले के मंत्री ए.आर. अंतुले का संसद में बयान आता है हिंदु आतंकवाद पर और फिर कांग्रेस के वर्तमान गृहमंत्री भी हिंदु आतंकवाद शब्द का प्रयोग करते है। हद तो तब हो जाती है जब कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी भी इसी भाषा में बोलते हुए सिम्मी और संध को एक ही तराजू में रख देते है।
और तो और कांग्रेस के एक कश्मीर मंत्री ने यह कह दिया कि कश्मीर को अलग कर देना चाहिए।



इन सब बातों पर गंभीरता से गौर करें और देखें की पाकिस्तान या फिर आतंकी संगठन इसको किस रूप में पेश करेगा। इस सारे प्रकरण को मिलाकर पाकिस्तान यह कह रहा है कि आतंकी देश मैं नहीं भारत है। आतंकी संगठन अपने जेहादियों को यह समझाने में सफल होगें की आतंकवाद भारत के हिंदू संगठन फैला रहें है।



सच में, कांग्रेस इस राजनीति में पाकिस्तान के साथ खड़ी दिखती है। अब जब कि विकिलिक्स के खुलासे में यह बात साफ हो गई मुंबई हमले का लाभ कांग्रेस लेना चाहती थी तब कहीं यह तो नहीं की कांग्रेस पाकिस्तान के साथ मिली हुई है। विकिलिक्स के खुलासे में तत्कालिन राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अमेरिका को भेजे अपनी रिर्पोट में कहा कि कांग्रेस मुंबई हमले का लाभ लेना चाहती है और इसके लिए कुछ संदिग्ध मुस्लिम नेताओं को चुना गया है जो मुस्लमानों के बीच जाकर इस आग को जिंदा रखने का काम करेगा।




अब एक बात ही कहनी बाकी है वह यह कि कांग्रेस के किसी नेता के मुंह से निकले कि मुंबई हमला पाकिस्तान प्रायोजित नहीं हिंदु संगठन प्रायोजित है और शांति के प्रतीक इस देश का बंटाधार हो जाए।













11 दिसंबर 2010

नीतीश कुमार ने विधायक फंड खत्म करने का लिया ऐतिहासिक फैसला।

सत्ता में दुसरी बार उम्मीद से ज्यादा बहुमत से आने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री को जहॉ लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई वहीं भ्रष्टाचार पर अर्जून की तरह मछली की ऑख पर निशाना साधते हुए नीतीश कुमार ने आज विधायक फंड को खत्म करने की पहल कर एक एंेतिहासिक फैसला लिया है। विधायक फंड को भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहा जाय तो यह अतिशयाक्ति नहीं होगी। विधायक फंड कई मायनों जन सारोकार की राजनीतिक धार को कुंद तो करती ही थी साथ ही साथ इसमें व्यापक तौर पर भ्रष्टाचार भी होता था। विधायक के क्षेत्र में विकास के लिए प्रतिवर्ष 1 करोड़ की राशि विकास मद में दी जाती थी। जिसका कोई सार्थक उपयोग नहीं होता था। अगर कहा जाय तो इसकी उपयोगिता शून्य प्रतिशत थी। शून्य प्रतिशत इस मायने में की इस मद से जो भी विकास का कार्य किया जाता था। उसका अस्तित्व एक साल होती थी। कुछ उदाहरण मैं दे सकता हॅू। विधायक मद से गॉव-गॉव चापाकल गड़े गये जिसकी सरकारी लागत 60000 होती थी पर इसमें विधायक जी का कमीशन 20 प्रतिशत अधिकारी का कमीशन 20 से 25 प्रतिशत तथा जो ठेकेदार काम कराया उसका कमीशन 15 से 20 प्रतिशत, अब वचा क्या? शेष राशि से जो चापाकल गाड़े गये वह एक माह भी प्यासों को पानी नहीं पिला सका।

एक और उदाहरण बरबीघा विधान सभा का। पिछले सत्र में यहॉ से पटना के जानेमाने न्यूरों सर्जन डा0 आरकृआर. कनौजीया विधायक बने। विधायक फंड के बार्बादी का नमूना यह कि विधायक जी ने 50 प्रतिशत कमीशन पर विधालयों में बिना राय जानें 50 लाख मुल्य की पुस्तक भेजवा दी। प्रभात प्रकाशन से खरीदी गई इन पुस्तकों में बच्चों के उपयोगिता लायका शायद ही किताब हो और आलम यह किताब विधालयों के स्टोर रूम में स़ड़ रहा है।
नीतीश कुमार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का दाबा करते हुए जनता से वोट की अपील और इस दिशा में उनके द्वारा उठाया गया यह कदम स्वागत योगय और ऐतिहासिक है।
नीतीश कुमार अपनी सभाओं में कहा करते है कि अब बिहार जो पहले करता है देश उसका अनुकरण करता है। आज विधायक फंड खत्म करने की पहल कर एक बार फिर नीतीश कुमार देश के सामने इसका अनुकरण करने का बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

10 दिसंबर 2010

गजल

कहीं आग नहीं, फिर भी धुआं क्यूं है।
तन्हाई के सफर में भी कारवां क्यूं है।

कभी तो खामोशी की जुवां को समझो साथी,
क्यों पूछते हो, यह अपनों के दरम्यां क्यूं है।

दुनियादार तुम भी नहीं हो मेरी तरह शायद,
तभी तो कहते हो कि जुल्म की इम्तहां क्यूं है।

यह नासमझी नहीं तो और क्या है,
कि जिस चमन में माली नहीं, और पूछते हो यह विरां क्यूं है।

शीशा-ऐ-दिल से दिल्लगी है उनकी फितरत,
गाफील तुम, पूछते हो संगदिल बेवफा क्यूं है।

इस काली अंधेरी रात में साथी चराग बन,
शीश-महलों को देख डोलता तेरा भी इमां क्यूं है।

कभी तो अपनी गुस्ताखियां देखों साथी,
की अब बन्दे भी यहॉ खुदा क्यूं है।





मैं चोर हुं...


                                          ईख की चोरी करने का अपना ही मजा है.

गजल




कहीं आग नहीं, फिर भी धुआं क्यूं है।
तन्हाई के सफर में भी कारवां क्यूं है।

कभी तो खामोशी की जुवां को समझो साथी,
क्यों पूछते हो, यह अपनों के दरम्यां क्यूं है।

दुनियादार तुम भी नहीं हो मेरी तरह शायद,
तभी तो कहते हो कि जुल्म की इम्तहां क्यूं है।

यह नासमझी नहीं तो और क्या है,
कि जिस चमन में माली नहीं, और पूछते हो यह विरां क्यूं है।

शीशा-ऐ-दिल से दिल्लगी है उनकी फितरत,
गाफील तुम, पूछते हो संगदिल बेवफा क्यूं है।

इस काली अंधेरी रात में साथी चराग बन,
शीश-महलों को देख डोलता तेरा भी इमां क्यूं है।

कभी तो अपनी गुस्ताखियां देखों साथी,
की अब बन्दे भी यहॉ खुदा क्यूं है।






06 दिसंबर 2010

बाबा साहेब का दिवाना- जूता पॉलीस कर गरीबों की करता है मदद।


जज्बा हो तो मजबूरियां बाधा नहीं होती है और ऐसी ही कर दिखाया है विकलंाग विनोद दास ने। बाबा साहेब का दिवाना विनोद दास बंजारों की जिंदगी जीता है। रहने को घर नहीं सोने को विस्तर नहीं अपना खुदा है रखबाला। विनोद दास रेलवे पलेटफॉर्म पर सोता है और जो मिल जाय वही खा लेता है।

विनोद दास पर उसकी जज्बा यह है कि गरीबों को ठंढ से बचाने के लिए आज  बाबा साहेब की  जयंती के अवसर पर कंबल बांटे। विनोद दास को कान से सुनाई नहीं देता है पर वह गरीबो की सेवा में हमेशा  तत्पर रहता है और भिक्षाटन कर पैसे जमा करता रहा है और गरीबों की मदद करता है। बाबा साहेब का दिवाना विनोद दास उनकी प्रतिमा को साफ सुथर रखने के लिए हमेशा  प्रयास करता रहता है।
विनोद दास गरीबों की सेवा का जज्बा अपने अंदर रखते है और जब पैसे की कमी हो जाती है तब वे दिल्ली जा कर जुता पॉलीस करते है और पैसे जमा कर गरीबों के बीच कभी कंबल तो कभी किताब का वितरण करते है।
आज इसी सिलसिले में संविधान निर्माता डा0 भीमराव अम्बेदकर की 54वीं निर्वाण दिवस मनाया गया। इस मौके पर चॉदनी चौक स्थित बाबा साहेब की प्रतिमा पर षेखपुरा पुलिस मेंस एसोशिएशनन के अध्यक्ष संतोष कुमार सिंह ने मुख्य अतिथि के तौर पर मार्ल्यापण कर पर निर्वाण दिवस मनाया। निर्वाण दिवस के अवसर पर ड0 बी.आर. अम्बेदकर सामाजिक न्याय अधिकारिता दलित युवा परिषद के अध्यक्ष विनोद कुमार दास के द्वारा बाबा साहेब के निर्वाण दिवस के अवसर पर 22 निःसहाय गरीबों के बीच कम्बल का वितरण किया।





आपके विचार मेरे लिये मर्गदर्शक का काम करते है, अत: अपने अमुल्य टिप्प्णी से मेरा मर्गदर्शन करें....

05 दिसंबर 2010

सुबह सुबह एक मगही कविता ....(नेतवा सब भरमाबो है )

अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
गली गली जे दारू बेचे, ओकरे खूब जीताबो है.

पहले हलथिन रंगबाज
फिर कहलैलथिन ठेकेदार
अब हो गेलथिन एमएलए
जनसेवका के सब हंसी उडाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.


सूट बूट है उजर बगबग
स्कारपीयों  करो है जगमग
टूटल साईकिल से ई लगदग
कहां से, कोय नै ई बतावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.



अनपढ़ हो गेलइ हे मास्टर
गोबरठोकनी हो गेलइ हे सिस्टर
बड़का बाप के बेटा हे डागडर
फर्जी डिग्री के फेरा में
ग्रेजुएट भैंस चराबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है


कभी मण्डल
कभी कमण्डल
कभी राम और
कभी रहीम
आग लगाके नेतवन सब
घर बैठल मौज उड़ावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है


की कुशासन
की सुशासन
गरीबन झोपड़ी नै राशन
चपरासी से अफसर तक
सभे महल बनाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है



लोकतन्त्र में
कागवंश के
राजहंश सब
बिरदावली अब गावो है
चौथोखंभा भी रंगले सीयरा संग 
हुआ हुआ चिल्लाबो है
हुआ हुआ चिल्लावो है..........

02 दिसंबर 2010

औरत का अस्तित्व कहां..

भोर के धुंधलके में ही
बासी मुंह वह जाती है खेत
साथ में होते है
भूखे, प्यासे, नंग-धडंग बच्चे

हाथ में हंसुआ ले काटती है धान
तभी भूख से बिलखता है ‘‘आरी’’ पर लेटा बेटा
और वह मड़ियल सा सूखी छाती बच्चे के मुंह से लगा देती है
उधर मालिक की भूखी निगाह भी इधर ही है।

भावशुन्य चेहरे से देखती है वह
उगते सूरज की ओर
न  स्वप्न
न अभिप्सा।

चिलचिलाती धूप में वह बांध कर बोझा लाती है खलिहान
और फिर
खेत से खलिहान तक
कई जोड़ी आंखे टटोलती है
उसकी देह
वह अंदर अंदर तिलमिलाती है
निगोड़ी पेट नहीं होती तो कितना अच्छा होता।

शाम ढले आती है अपनी झोपड़ी
अब चुल्हा चौका भी करना होगा
अपनी भूख तो सह लेगी पर बच्चों का क्या।


नशे में धुत्त पति गालिंयां देता आया है
थाली परोस उससे खाने की मिन्नत करती है।

थका शरीर अब सो जाना चाहता है
अभी कहां,
एक बार फिर जलेगी वह
मर्दाने की कामाग्नि में।

आज फिर आंखों में ही काट दी पूरी रात
तलाशती रही अपना अस्तित्व।

दूर तक निकल गई
कहीं कुछ नजर नहीं आया
कहीं बेटी मिली
कहीं बहन
कहीं पत्नी मिली
कहीं मां
औरत का अपना अस्तित्व कहां....





तस्वीर- गुगल से साभार

चौथाखंभा: वर्तमान समर के सदंर्भ में

चौथाखंभा: वर्तमान समर के सदंर्भ में: "समर भूमि मेंसत्य की पराकाष्ठाकर्ण की परिणति की पुर्नावृति होगी।औरअसत्य की पराकाष्ठाबनाएगा `दुर्योधन´-कालखण्डों का खलनायक।शेषकृष्ण की तरहसत्य..."

01 दिसंबर 2010

बच्चों के इस ज्जबे को सलाम.....

बिहार के शेखपुरा जिले के बरबीघा में एड्स जागरूकता को लेकर बच्चों का रेड रीवन.

28 नवंबर 2010

ये है मेरा बिहार- जागरूक और जवान


ये है मेरा बिहार जिसे राजनीतिक तौर से जागरूक समझा जाता है और इसकी वानगी यहां देखिए।

शेखपुरा जिला मुख्यालय के चांदनी चौक पर स्थित एक चाय दुकानदार की चर्चा अहम है। पच्चीस नवम्बर को इस चाय दुकान पर चाय पीने अपने मित्र के साथ गया था और चाय का आर्डर देकर बैठा ही था की तभी एक बुजुर्ग के द्वारा  पढ़े जा रहे अखबार पर नजर पड़ी और वरबस ही समय बिताने के लिहाज से अखबार पढ़ने की  इच्छा जगी और तभी ध्यान इस बात पर गया कि बुजुर्गवार संपादकीय पन्ना उल्टे हुए है। फिर हमलोग चाय पीने लगे और करीब 20 से 25 मिनट तक चाय दुकान पर गप्पबाजी भी होती रही और जब जाने का उपक्रम हुआ तो मैं अखबार देने के लिए बुजुर्ग की तरफ बढ़ा और चौंक गया। बुजुर्गवार अभी पूरी तल्लीनता से संपादकीय पन्ना पर छपे आलेख पढ़ रहे थे। मैं चौंक पड़ा! आधे धंटे से बुजुर्ग आदमी संपादकीय पढ़ रहे है। मैं वरबस  ही उनकी ओर मुखातिब होकर पूछा कि ‘‘बाबा क्या कर पढ़ रहें है’’। तब उनकी तन्द्रा टूटी और कहा ‘‘बउआ स्पेक्ट्रम घोटाला के बारे में पढ़ रहें है, कांग्रेस वाले लोग भाजपा पर आरोप लगा रहें है कि संसद नहीं चलने दे रहें है और आज राष्ट्रीय सहारा में भी इसी पर आलेख छपा है। भला बताईए इसमें भाजपा का क्या दोष, दोषी तो कांग्रेस है। क्यों नहीं जेपीसी का गठन कर संसद को चलने देती है, जब वह चोर नही है ंतो डरती क्यों है।’’
इस युवा बुजुर्ग ने अपना नाम जगदीष प्रसाद तथा उर्म पच्चासी साल बताया। और कुरेदने पर उन्होंने बताया कि सालों से वे संपादकीय पन्ना पढ़ रहें है और मांग मांग कर भी वे सभी अखबारों के संपादकीय पन्ना जरूर पढ़ते है। संपादकीय क्यों पढ़ते है पूछने पर उन्हांेने बताया कि और पन्नों में तो बउया फालतू समाचार रहता है और जब से अखबार क्षेत्रीय हुआ है पूरे देष की बात तो छोड दिजिए बिहार की खबर नहीं मिलती और संपादकीय पन्ना पर ही देष की हालात की जानकारी मिलती है।

यह बात बहुत छोटी है, पर यही है मेरा बिहार। यहां मामुली सा चाय दुकान चलाने वाले पच्चासी साल का बुजुर्ग आदमी देश की राजनीति को समझना और जानना चाहते हैं उसपर खुल कर चर्चा करता है। 



इसी कड़ी में एक बात और जोड़ना चाहता हूं। हमलोगों के गर्जीयन है वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी बासुदेव वरणवाल। उर्म 92 साल। जगरूकता इतनी कि प्रतिदिन जिले के सभी पत्रकारों को मोबाइल कर पूछ लेते है कि कुछ नया तो नहीं है। नीतीश की सभा में भाषण देने चले गए जबकि उस दिन गर्मी बहुत थी और आने के क्रम में बेहोश भी हो गए। सभी अखबारों पर खासी नजर रखते है और राष्ट्रीय खबरों पर हमलोगों के साथ बैठ कर बहस करते है। कह सकता हूं कि मैं नैजवान होकर भी उनके इतना जागरूक नहीं हूं।

यही है मेरा बिहार..............................


27 नवंबर 2010

उल्‍टे अक्षरों से लिख दी भागवत गीता


: मिरर इमेज शैली में कई किताब लिख चुके हैं पीयूष : आप इस भाषा को
देखेंगे तो एकबारगी भौचक्‍क रह जायेंगे. आपको समझ में नहीं आयेगा कि यह
किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है. पर आप ज्‍यों ही शीशे के सामने
पहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी. सारे अक्षर सीधे नजर
आयेंगे. इस मिरर इमेज किताब को दादरी में रहने वाले पीयूष ने लिखा है. इस
तरह के अनोखे लेखन में माहिर पीयूष की यह कला एशिया बुक ऑफ वर्ल्‍ड
रिकार्ड में भी दर्ज है. मिलनसार पीयूष मिरर इमेज की भाषा शैली में कई
किताबें लिख चुके हैं.
उनकी पहली किताब भागवद गीता थी. जिसके सभी अठारह अध्‍यायों को इन्‍होंने
मिरर इमेज शैली में लिखा. इसके अलावा दुर्गा सप्‍त, सती छंद भी मिरर इमेज
हिन्‍दी और अंग्रेजी में लिखा है. सुंदरकांड भी अवधी भाषा शैली में लिखा
है. संस्‍कृत में भी आरती संग्रह लिखा है. मिरर इमेज शैली में
हिन्‍दी-अंग्रेजी और संस्‍कृत सभी पर पीयूष की बराबर पकड़ है. 10 फरवरी
1967 में जन्‍में पीयूष बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं.
डिप्‍लोमा इंजीनियर पीयूष को गणित में भी महारत हासिल है. इन्‍होंने बीज
गणित को बेस बनाकर एक किताब 'गणित एक अध्‍ययन' भी लिखी है. जिसमें
उन्‍होंने पास्‍कल समीकरण पर एक नया समीकरण पेश किया है. पीयूष बतातें
हैं कि पास्‍कल एक अनोखा तथा संपूर्ण त्रिभुज है. इसके अलावा एपी अधिकार
एगंल और कई तरह के प्रमेय शामिल हैं. पीयूष कार्टूनिस्‍ट भी हैं. उन्‍हें
कार्टून बनाने का भी बहुत शौक है.

25 नवंबर 2010

नीतीश, बिहार और जीत के मायने

बिहार को राजनीति का तीर्थ कहा जाता है तथा यहां के लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक और इस चुनाव परिणाम ने भी इस बात को नीतीश कुमार की जीत के रूप में पुख्ता कर दिया। नीतीश कुमार के इस जीत के कई मायने है और तरह तरह के विष्लेशण भी किये जा रहे हैं। सच भी है, ‘‘जो जीता वही सिंकदर’’।

पर बात अब यहां से यह शुरू होती है कि आखिर इतनी बड़ी जीत के क्या मायने है! राजनीति में किसी के पास जादू की छड़ी नहीं होती और इस बात को नीतीश कुमार ने अपनी जीत के बाद स्वीकार भी किया। तब फिर ऐसा क्या हो गया कि नीतीश कुमार के गठबंधन को 206 सीटें मिली और विपक्षी राजद गठबंधन को मात्र 22 सीटें । और तो और, कांग्रेस मात्र चार सीट पर सिमट गई। क्या यह सब कुछ किसी जादू के दम पर हुआ है। नहीं! 

नीतीश कुमार के इस ऐतिहासिक जीत के कई मायने है जिसमें से नेशनल स्तर की मायने की बात यदि की जाय तो बिहार के जागरूक मतदाताओं ने देश को वंशबादी राजनीति में महारानी और युवराज के तिलिस्म उघाड़ कर यह साफ कर दिया कि बात बनाने से बात नहीं नहीं बनती, काम करने से बात बनती है। राहुल गांधी की सभा को कवर करते वक्त ही इस बात कर एहसास हो गया था कि राहुल गांधी के पास आम आदमी की राजनीति की समझ नहीं है और वे एक युवराज सरीखे तिलिस्म के सहारे के देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। छोटी सी पर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात यह कि शेखपुरा जिले के बरबीघा में राहुल की सभा थी और सभा स्थल से 300 मीटर की दूरी पर स्थित थी बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह की प्रतिमा, जिसे बिहार के राजनीतिज्ञ तीर्थ के रूप में पूजते है पर राहुल गांधी ने प्रतिमा पर न तो माल्यार्पण किया, न ही सभा में उनके प्रति श्रद्धांजली व्यक्त की। यहां तक की सभा में जिस अषोक चौधरी के लिए वोट मांगने राहूल आये थे उनका भी एक बार जिक्र नहीं किया और दोनों बातों को सभा में आये लोगो ने तुरंत नोटिस लिया और इसकी चर्चा जंगल में आग की तरह फैल गई। 

सोनीया, मनमोहन और राहुल की सभाओं में भीड़ तो थी पर आम आदमी के मंहगे निबाले का दर्द भी सभाओं में था तब बिहार के जागरूक जनता ने लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर कांग्रेस को नकार कर देश को यह संदेस्श दिया की आम आदमी के दुखस-दर्द को समझने वाला ही लोकतंत्र का प्रहरी हो सकता है न की वह जो दलितों के घर जाने का प्रहसन करता हो!

लालू यादव की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। लालू यादव हुर्र हुर्र-हुर्र हुर्र की राजनीति के सहारे नीतीश को पटखनी देना चाहते थे और उन्हें यह समझ ही नहीं रही की बिहार जाति की राजनीति से उपर उठकर विकास की बात सुनना चाहता है। लालू यादव नीतीश कुमार के विकल्प नहीं हो सकते। वह इसलिए की नीतीश कुमार विकास की बात करते थे और लालू यादव अपने और रामविलास के स्वजातियों के सहारे स्वयं मुख्यमंत्री और रामविलास के भाई को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात पर वोट मांगते थे। अपनी सभाओं में लालू जी के द्वारा कोई गंभीर चर्चा नहीं की जाती थी। रटा-रटाया संबोधन और प्रहसन। स्टेज पर मौजूद कार्यकर्त्ता और पार्टी नेता को हड़काना और हुर्र हुर्र कर हंसी बटोरना, भाषण कम और नौटंकी अधिक करना। रही सही कसर लालू और रामविलास ने अपने अपने बेटे तेजस्वी-चिराग को आरजेडी-एलजेपी प्राइवेट लिमटेड कंपनी के पोलिटिकल प्रोडक्ट की लांचिग करके पूरी कर दी। जहां नीतश कुमार भाई भतीजाबाद से कोसों दूर थे वहीं बिहार लालू एण्ड कंपनी को देख रही थी।


नीतीश कुमार की बात की जाय तो यह अब साफ हो गया कि बिहार की नब्ज पर उनकी हाथ थी। विकास यात्रा और विश्वास यात्रा के माध्यम से जहां वे जनता को अपनेपन का एहसास कराते रहे वहीं महादलित और अतिपिछड़े की राजनीति से आगे बढ़ कर दुनिया की आधी आबादी को राजनीतिक रूप से जागरूक कर अपना एक प्रबल जनाधार बना लिया। चुनाव के दिन बुथों पर यही जनधार लंबी लंबी कतारों में दिखी। शायद देश की राजनीति में यह पहली बार हुआ होगा की घरेलू महिलाओं ने पतियों से विद्रोह कर अपनी पार्टी को तीर छाप पर वोट दिया। महिलाओं के मनोदशा को ऐसे समझा जा सकता है कि जब 24 की रात को मैं घर लौटा तो पत्नी ने उत्साहपुर्वक कहा ‘‘ देखे हमारी पार्टी की जीत हुई’’। यह नीतीश कुमार के इस बड़ी जीत का सबसे बड़ा कारक है। सड़क, शिक्षा और सुरक्षा जहां पर्दे के आगे दिख रही थी वहीं नीतीश का सोशल इंजिनियरिंग पर्दे के पीछे से निर्देशन कार्य को बखूबी अंजाम दे रहा था और इस सब में गुम हो गया गली गली  शराब की बहती नदी, शिक्षा के गिरते स्तर और नौकरशाहों को उदण्ड रवैये का मुद्दा गिरते

नीतीश कुमार ने जनता के नब्ज को अपने पहले चरण के चुनाव में नाप लिया और समझ गए की बिहार में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा है और अपनी सभाओं में भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने का ऐलान करते हुए उनकी संप्पति को जब्त करने की बात करने लगे।

नीतीश और भाजपा के द्वारा प्रायोजित तौर से नरेन्द्र मोदी को उछाला गया जिससे नीतीश कुमार का धर्मनिरपेक्ष चेहरा बाहर निकला और परिणामतः मुस्लीम बुथों पर भी जदयू को सर्वाधिक मत मिले।

और अन्त में यह कि नीतीश कुमार लालू यादव का भय दिखाते हुए जनता को यह संदेश देने में सफल रहे कि लालू यादव का मतलब बिहार में जात-पात की राजनीति है, अपराध-अपहरण का बोल बाला है। लालू यादव का मतलब लंबी लंबी कुर्तेवालों की गुण्डागर्दी है।

लब्बोलुबाब यह की नीतीश कुमार के इस बड़ी जीत के कई मायने भले हो सकते है पर बिहार में नीतीश कुमार का बिकल्पहीनता, एक बड़ा कारक है।

20 नवंबर 2010

एक्जिट पोल का पोल खोल .

न्यूज चैनलों में जब एंकर बुलंद आवाज मंे यह दाबा करतें हैं कि मेरे चैनल का सर्वे सबसे विष्वसनीय और भरोसे के लायक है तब मन घृणा से भर जाता है। घृणा से भरे हुए मन में बार बार यह सवाल आता है कि आखिर यह सर्वो होता कहां है। कुछ कंपनियों के सर्वो को मैंन भी जानता हूं और यह भी देखा है की किस तरह सर्वे हुआ।

आइए देखें सर्वे का हाल। चुनाव के दो दिन पुर्व मेरे मित्र स्टींगरों को एक विधान सभा क्षेत्र में पांच लड़कांे को रखने की खबर आती है और प्रत्येक लड़कों को 10 बुथ पर जाकर वोटरों से किसको वोट दिया सरीखे कई सवाल करने थे। इस काम के एवज मे प्रत्येक लड़कों को 250 रू. मिलने थे। अब मेरे मित्र ने क्या किया। अपने 10 परिचितों का मोबाइल नंबर संस्था को दे दिया और चुनाव के दिन संस्था के द्वारा पूछे जाने पर मनगढ़त जबाब दे दिया गया साथ ही सर्वंे के लिए मिले प्रफॉर्मा को भी बैठ-बैठे भर दिया गया और ऐसा एक जिले में नहीं हमारे आसपास के कई जिलों में किया गया और सर्वो के लिए रिर्पोटरों को मिलने वाली राषि गटक नारायण। यही है सर्वे और यही है एक्जिट पोल।

एक चैनल पर जब चीख चीख कर यह कहा जा रहा था की बिहार में फैले मेरे हजारों रिर्पोटरों ने इस सर्वे के काम को इमानदारी से अंजाम दिया है तो मेरे एक मित्र रिर्पोटर पूछ रहे थे कि यार मैं बिहार में नहीं हूं क्या। फिर जब मुझकों इसकी कोई खबर नही ंतो अन्य का भी यही हाल होगा।

एक्जिट पोल का यही हाल है। आज उसी कंपनी का एक्जिट पोल आया हुआ था और चैनल सबसे  सटीक होने का दाबा कर रही थी भला बताईए यह कैसे सटीक होगा..........









18 नवंबर 2010

हत्यारी पुलिस, खामोश मीडिया और बढ़ता नक्सलबाद

इससे पहले कि सुख जाऐं
आओ चलो
झीलों में पंख छपछपाएें
हत्यारी गोलियों को
चोंच में दबाऐं
और उड़ते चले जाऐं

दिनेश कुमार शुक्ल की यह कविता दस बारह साल पहले वामपन्थी पत्रिका समकालिन जनमत में पढ़ा और उसकी कतरन आज भी मेरी डायरी में दबी हुई है और आज बरवस उसकी याद आ गई....
मंगलवार को धनबाद की घटना गरीब आदमी के प्रति पुलिस और मीडिया को कठघरे में खड़ी करती है। एक केन्द्रीय अर्ध सैनिक बल (सीआईएसएफ) के स्कूल भान चालक नौजवान को धनबाद पुलिस चोरी की मोटरसाईकिल बेचने के आरोप में पकड़ती है पर पुलिस को उसके जेब से एक वोट वहिष्कार का नक्सली पर्चा मिलता है। फिर पुलिस की यातनाओं का सिलसिला और मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज फ्लैस करने की होड मच जाती है। न तो मीडिया यह पता लगाती है कि गिरफ्तार युवक नक्सली है या नहीं और न ही पुलिस इसकी छानबीन करती है और पुलिस की बर्बर थर्ड डिग्री से युवक की हाजत में ही मौत हो जाती है। झारखण्ड राज्य के बोकारो के नाबाडीह थाना क्षेत्र के मानपुर निवासी 30 वषिZय धिरेन्द्र सिंह कसे नक्सली कह कर पुलिस के द्वारा मार दिया जाता हैं और मीडिया में यह खबर दब जाती है या फिर खानापुर्ति की जगह पाती है। 

इस घटना में युवक के मरने के बाद धनबाद एसपी ने यह बात कबूली है कि गिरफ्तार युवक नक्सली नहीं है और उसके विरूद्ध कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। 

जब हमने इसकी जांच करने के धनबाद के मीडिया सहकर्मियों से बात की तो उनकी झुंझलाहट सामने आई और इसमें जो बात सामने आई वह चौंकानेवाला और खतरनाक है। मृतक युवक धिरेन्द्र सिंह को रास्ते में कहीं नक्सली पर्चा मिला और उसे उसने पढ़कर जेब में रख लिया था और उसी के आधार पर पुलिस और मीडिया ने उसे नक्सली धोषित कर दिया। कई चैनलों और अखबारों ने थाने में नक्सली की मौत की खबर परोसी। किसी ने रहस्यमय तरीके से मौत लिखा तो किसी ने पुलिस की पिटाई से नक्सली की मौत।

खतरनाक बात यह कि जिस बरवाअडडा पुलिस इंस्पेक्टर सहदेव प्रसाद ने उसकी हत्या कि वह पोस्टमार्टम को प्रभावित करने के लिए डाक्टर को खरीद चुका है और सादे कपड़े में वह पोस्टमार्टम हाउस में लगातार देखा गया।

सहकर्मी मीडियाकर्मी ने अपने गुस्से का इजहार कुछ यू किया ``क्या कहें लगातार चैनल को हर धंटे खबर करता रहा और फीट भेजता रहा पर न्यूज को महत्व ही नहीं मिला।´´
छोटी छीटी खबर को खेलने में माहीर मीडिया को क्या हो गया। क्या युवक गरीब था इसलिएर्षोर्षो

मामुली मारपीट के मामले में घरों को घेर का अभियुक्त को गिरफ्तार करने वाली पुलिस आज अपनों के साथ ऐसा क्यों नहीं कर रहीर्षोर्षो


अन्त में नक्सलबाद के दशकों सफर में इसके दमन को लेकर जितने प्रयास हुए असफल रहे और  नक्सलबाद का दायरा बढ़ता गया। नक्सलबाद आज भी है पर आज चारूमजुमदार और कानू सान्याल के सिद्धान्त की तिलान्जली देकर धन और ताकत के लिए नक्सलबादी होने का आरोप लगता है और इस सब के बीच हम चूक जाते है उस आम आदमी के नक्सली बनने के दर्द को समझनेे में जिसने यातनाओं और अन्याय के विरूद्ध हथियार उठाया और उसे सिखाया गया हथियारों के बल पर शोषण के विरूद्ध संधर्ष करना।

जब तक विकास से वंचित वर्ग के लिए योजनाओं को जमीन पर नहीं उतारा जाएगा और जब तक ऐसे निर्दोश युवक को पुलिस इसी तरह मौत के घाट उतारती रहेगी नक्सलबाद बढ़ता रहेगा..........

17 नवंबर 2010

नेता जी..

नेता जी

परम् आदर-णीय नेता जी करते हैं राज-नीति,

किस तरह किया जाय राज, बनाई है एक नीति।


क्षेत्र के दबंगों को इनका हैं संरक्षण,
विकास मद का साथ साथ कर रहे हैं भक्षण।

ब्युरोके्रटों से इनका गहरा सम्बंध है,
कुछ तुम खाओ,
कुछ  हम खायें, यही अनुबंध है।

इसी तरह से चलता इनका तन्त्र है
ठेकेदार, डीलर और चम्मचे खास इनका यन्त्र है।

16 नवंबर 2010

अक्षय नवमीं के मौके पर आंवला वृक्ष की पूजा।


शेखपुरा (बिहार)

आवंले का अपना वैज्ञानिक महत्व तो है ही धार्मिक महत्व भी कम नहीं है। आंवला के इसी महत्व को दशZता है कि अक्षय नवमीं का पर्व। अक्षय नवमीं के अवसर पर नगर के सामाचक मोहल्ले में स्थित बगीचे में आंवला वृक्ष की पूजा की गई एवं भुआ दान किया गया। परंपरागत रूप में लोगोें ने इस स्थान पर भोजन बनाया और परिजनों कें साथ ग्रहण कर प्राकृतिक संपदा को सम्मान दिया। अक्षय नवमीं के  मौके पर आयोजित मेले में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया जिसमें महिलाओं ने वहां पर झूला का आनन्द भी लिया। मेले में प्रशासनीक स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं थी और पुलिस कें द्वारा सुरक्षा को लेकर भी कोई इन्तजाम नहीं किया गया था।
अक्षय नवमीं के मौकें पर पूजा करा रहे पुरोहित सदानन्द झा ने बताया कि कार्तिक माह में आंवला की पूजा का पौराणीक महत्व है और आंवले के पेंड़ में भगवान विष्णु के निवास करने की बात कही गई है और इसी लिए कार्तिक के नवमीं के दिन स्वस्थ्य और दिर्धायु होने की कामना के साथ आंवला की पूजा की जाती है साथ ही भुआ दान भी किया जाता है। आंवलें के पेंड़ के नीचे महिलाओं के द्वारा भोजन बनाया जाता है।

दुनिया का अनोखा जुआ मेला।

शेखपुरा (बिहार)

 शेखपुरा जिले के बरबीघा थाना के गौशाला मैदान में छठ के परणा दिन से सजा जुआ मेला तीन दिनों तक चलता है और पुलिस नज़राना बसुलती है। सामाजिक विकृति के रूप प्रचलित यह जुआ का मेला सुबह से लेकर देर रात तक चलता है जिसमें भाग लेने के लिए दूर दूर के गांव से लोग आते है साथ ही नगर के लोग भी बड़ी मात्रा में जुआ खेलते है। इस जुआ मेला में कई ने हार का सामना किया तो कई जीत कर घर चले गए। जुआ मेला गौशाला मैदान से लेकर बगीचों में लगाया गया जहां झुण्ड के झुण्ड लोग जुआ खेलते देखे गए। जुआ में खास तौर पर झण्डी मुण्डी और ताश पर लोग जुआ खेलते नज़र आये। 
इस संबध में लोगों की माने तो सौ साल से पहले से ही यह जुआ मेला यहां लगता आ रहा है और इसकी ख्याती कई जिलों में है। जुआ मेला को प्रशासन की मौन सहमति भी होती है और उसके लिए नज़राने की व्यवस्था सभी जुआ संचालको के द्वारा किया जाता है।

14 नवंबर 2010

स्पेक्ट्र धोटाले को दबाने की साजीश है सुदशZन प्रकरण पर बबाल।

जब भी कांग्रेस घोटालों में फंसती है और उसे संसद में  जबाब देना होता है वह विवादास्पद मुददों को उठा कर जनता का ध्यान दुसरी दिशा में ले जाने की साजीश करती है।
कांग्रेस पर भी हमला होगा यह बात उसे तभी समझ लेनी चाहिए थी जब कांग्रेस के द्वारा हिन्दु आतंकबाद जैसे शब्द गढ़े गए और कांग्रेस जिसे युवराज के रूप में थोप रही है उसने सिम्मी और संध को एक कठधरे में खड़ा कर समुचे देश को झकझोर दिया और लोग स्तब्ध हो गए आखिर मुस्लिम तुष्टीकरण नीति को लेकर कांग्रेस किस सीमा तक जाएगी।

 यह सब राजनीति है और देश के लोगों का ध्यान असल मुददों से भटकाने की एक साजीश। बात जब गाली देने की हो तो उसके लिए सब को आजादी है पर यह आजादी देश की कीमत पर हो यह खतरनाक है। कांग्रेसनीत सरकार और उसके मुखीया सोनीया गांधी के सम्बंध में जो कुछ भी संध के पुर्व प्रमुख सुदशZन ने कहा है वह सच न भी तब भी कहीं धुंआं तो है। कहते है कि बिना आग का धुंआं नहीं होता तब सुदशZन का यह बोलना कि सोनीया गांधी सीआइए का एजेंट है हंगामा बरपा रहा है। कांग्रेस के लोग सड़कों पर उतर आए है लगा जैसे देश पर विदेशी हमला हो गया हो पर 1.76 लाख करोड़ के स्पेक्ट्रम घोटाले पर से ध्यान हटाने की यह कांग्रेसी साजीश समझनी होगी। सोनीया गांधी के बारे जनता पार्टी के प्रमुख सुब्रमन्नयम स्वामी सालों से इस तरह कें आरोप लगा रहे है और इसको लेकर अदालत का दरबाजा भी खटखटाया पर उनकी आवाज गुम हो गई पर उनकी बेब साइट पर जो जानकारी है वह यदि सच है तो इस देश के बंटाधार होने से कोई नहीं बचा सकता है।

कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी जब कहते है कि सिम्मी और संध एक है तब भी कांग्रेस की यह साजीश समझनी होगी। जब कांग्रेस की ओर से हिन्दु आतंकबाद जैसे शब्द गढ़े जाते है तब भी कांग्रेस की इस साजीश को समझनी होगी। कई धोटालों में फंसी कांग्रेस की सरकार बेशर्मी से यह कहती है कि घोटाला नहीं हुआ जबकि कैग के रिर्पोट में यह बात आती है और इसकें बाद सरकार जाने का भय साफ साफ दिखता है। जब बात सरकार के गिरने की आ जाए तब भला देश को बचाने के लिए कौन सोंचेगा। डी राजा या फिर सुरेश कलमाड़ी महज एक मोहरा है और उसके पीछे कांग्रेस की सरकार की मंशा साफ झलकती है। डी राजा प्रकरण में प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की चुप्पी बेचैन करने वाली है। कुछ भी प्रधानमन्त्री को कोई कठपुतली कह दे पर उनके उपर भ्रष्टाचार कें आरोप नही लगे तब फिर स्पेक्ट्रम घोटाले में उनकी चुप्पी उनकी बेवसी है या कुछ और यह तो वही जाने पर जब भाजपा के लोग आरोप लगाते है कि इस घोटाले में प्रधानमन्त्री से लेकर कांग्रेस प्रमुख तक हाथ है इसपर स्वाभाविक रूप से जनता के बीच सवाल चला जाता है कि जब 1.75 लाख कारोड़ के घोटाले की बात थी तब प्रधानमन्त्री क्यों कान में रूई देकर सो रहे थे। 

हां एक बात और संध भले ही धर्मिक भवना की राजनीति करती हो पर उसे कोई आतंकबादी संगठन नहीं कह सकता जबकि सिम्मी एक आतंकबादी संगठन है और इस बात को बुद्विजीवी लोग भी मानते है। संध ने हमेशा से देश सेवा की राजनीति की है और उसके रास्ते उनके अपने भी है पर कांग्रेस ने जिस हिन्दु आतंकवाद शब्द की नींब डाली है वह यदि सच हो गया तो भारत के किसी भी सरकार से सम्भाल पान मुिश्कल हो जाएगा। 

राजनीति अपनी जगह है और देश अपनी जगह। वह चाहे आर एस एस हो या कांग्रेस, उथली राजनीति मुददों को उछाल कर जनता का ध्यान भटकाने की यह राजनीति देश के लिए खतरनाक है।

एक बात और मैं साफ कर दूं की मैं कभी ही सम्प्रादायिकता का पैरोकार नहीं रहा और न रहूंगा पर दोगली धर्मनिरपेक्षता से मुझे घिन्न आती है और कुछ लोग धर्मनिरपेक्ष कहलाने के लिए देश के साथ खिलबाड़ करते है।

12 नवंबर 2010

आस्था का प्रतीक है तेउस का सुर्यमन्दिर

आस्था का प्रतीक है तेउस का सुर्यमन्दिर

छठ को लोक आस्था का पर्व कहा जाता है और ऐसा कुछ देखने को भी मिलता है। लोक आस्था का महान पर्व छठ शेखपुरा जिले में सूखे की मार को झेल रहा है और कई तालाब जहां छठवर्ती माताऐं अध्र्य देती आज सूखा है पर श्रद्धालूओं का हौसला इससे भी कम नहीं हुआ। एक तरफ जहां लोग सभी काम को लेकर सरकारी अमलों को कोसते है पर वहीं बरबीघा प्रखण्ड कें तेउस गांव स्थित सुर्य मन्दिर और साई मन्दिर परिसर स्थित तालाब में लाबालब पानी भरा हुआ है और घाटों की सफाई देखते बनती है पर ऐसा कुछ प्रशासनिक पहल से नहीं बल्कि जनआस्था और जनसहयोग से हुआ। जनसहयोग से ही इस पूरे मन्दिर और तालाब के घाटों का निर्माण किया गया है और ग्रामीण वातावरण की सौम्यता और रमणीय शान्ति लोगों के श्रद्धा का केन्द्र बन गया और दूर दूर से छठवर्ती यहां आकर भगवान भाष्कार की आराधना करते है।


इस मन्दिर के सम्बंध में ग्रामीणों की माने तो पूर्व मुखीया महेन्द्र नारायण सिंह को इसकी प्रेरणा मिली थी और उन्होने इसकी योजना भी बनाई पर उनके देहावशान के बाद अमेरिका में रह रहे उनके पुत्र ने इस मन्दिर की आराधशीला रखी और ग्रामीणों के सहयोग से आज यह एक रमणीक स्थल बन चुका है। 
सुखे की मार की वजह से कई तालाबों में बोरिंग से पानी भर जा रहा है और छठ घाट की सफाई की जा रही है पर तेउस के लोगों ने जनसहयोग से ऐसी व्यवस्था कर समाज कें लिए एक आदशZ पेश किया है।


10 नवंबर 2010

धर्म और जाति के समानता का पर्व है छठ। नहाय खाय के साथ छठ प्रारंभ।

लोक आस्था और सुर्योपासना का महापर्व छठ जहां डूबते सुर्य के पहले और उगते सुर्य को बाद में अध्र्य देेकर आराधना करने के लिए विश्व प्रसिद्ध है वहीं सामाजिक समरसता और धार्मिक सौहार्द भी इसकी बुनियाद है। छठ पर्व जहां धार्मिक सन्देश के रूप में सृष्टिकर्ता भगवान भास्कार की आराधन का प्रतिक है वहीं इस पर्व में पूजा के तौर पर प्रयोग किए जाने वाली सामग्री समाज को जोड़ने का सन्देश देती है। 


खास, जिस वर्ग को हम अछूत मानते है उसी वर्ग के द्वारा बनाए गए सूप, मौनी और डाला से भगवान भाष्कर की आराधन की जाती है। बांस के छोटी छोटी कमानीयों ने डोम जाति का पूरा परिवार एक माह से रात दिन एक कर इस काम को कर रहा है और लोग उसी सूप को खरीद पूजा करते है। कुंभार जाति कें द्वारा बनाए गए मिटटी के बर्तन को ही पवित्र माना जाता है और धनवान लोगों के घरो में भी मिटटी कें वर्तन में ही प्रसाद बनाया जाता है। साथ फलों की दुकानों को मुस्लिम समुदाय के लोगों के द्वारा विशेष रूप से सजाया जाता है और छठवर्ती माताऐं वहां से फल खरीद कर सुर्य भगवान की पूजा करती है। 


छठ का माहात्मय इस मायने में और बढ़ जाता है कि चार दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक अनुष्ठान में पवित्रता का मुख्य ध्यान रखा जाता है और घर ही नहीं गलियों और सड़कों की सफाई भी प्रमुखता से की जाती है। गांवों में जहां पूजा को लेकर एक पखबाड़ा पूर्व ही तैयारी कर दी जाती है और परंपरागत लोकगीत गाती महिलाऐं सुबह चार बजे ही सुर्य के उगने से पूर्व ही कार्तिक स्नान करती है और गलियों में झाडू लगाती है। 


पूजा के लिए भी प्रसाद का अपना अनूठा अन्दाज छठ पर्व देखने को मिलता है जिसमें प्राकृति को अंगीभूत करने का सन्देश जाता है। नहाय-खाय के दिन घरों में पवित्रता के साथ कददू (लौकी) का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है तथा कददू की सब्जी के साथ साथ दाल में भी कददू के छोटे छोटे टुकड़े मिलाए जाते है। लौकी की पकौड़ी भी आज प्रमुखता से बनाई जाती है और चने का दाल तथा भात को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। 

खरना के दिन पवित्रता ही उपासना का मार्ग बन कर सामने आता है और छठवर्ती माताऐं आज से जारी उपवास को तीसरे दिन खत्म करती है। लोहण्डा के दिन अरबा चावल का भात और चने के दाल तो बनती ही है पर इसमें साधारण नमक की जगह सींधा नमक और गोलकी का ही प्रयोग किया जाता है जिसे वैज्ञानिक रूप से उपयोगी माना जाता है। साथ ही प्रसाद के रूप में गाय का दूध प्रयोग किया जाता है। 
पहली अध्र्य के घरों में पकबान बनाए जाते है तथा अध्र्य के लिए ईख, नारंगी, सेव, पानीफल, मूली, नारीयल सहित कई अन्य फलों का प्रयोग किया जाता है। 

वस्तुत: छठ को जहां विश्व में अनुठा त्योहार के रूप में लोग जानते ही है  वहीं यह सामाजिक सौहार्द का प्रतिक एक प्राकृतिक त्योहार भी है।






09 नवंबर 2010

शेखपुरा, -----------------------------मतदान को लेकर वोटरों में उत्सव का नजारा दिखा। घंटो धूप में खड़े रह कर महिलाओं ने लिया बढ़चढ़ कर हिस्सा।

मतदान को लेकर वोटरों में उत्सव का नजारा दिखा।
घंटो धूप में खड़े रह कर महिलाओं ने लिया बढ़चढ़ कर हिस्सा।
शेखपुरा, 


चुनाव आयोग की चौक चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था के बीच जिले के मतदाताओं ने शान्तिपूर्ण तरीके से अपने मत का प्रयोग किया। जिले के किसी भी कोने से छिटपूट शिकायतों को छोड़कर कहीं से अप्रिय घटना की शिकायत नहीं मिली है। दोनों विधान सभा शेखपुरा तथा बरबीघा के कुल चार सौ बारह केन्द्रों पर मतदाताओं ने सुबह सात बजे से लेकर शाम पॉच बजे तक बुथों पर मतदान किया। इस दौरान बरबीघा विधान सभा अन्तर्गत बुथ संख्या 12 के सरैया गॉव के सैकड़ों लोगों ने वोटर लिस्ट पर अंकित नाम को लाल स्याही से काट दिये जाने पर वोटरों को वोट से वंचित किये जाने पर मतदाताओं ने हंगामा मचाया। जिसे बाद में निर्वाची पदाधिकारी के निर्देश पर मतदाताओं वोट डालने देने का निर्देश दिये जाने पर मामला शान्त हुआ। वहीं शेखपुरा विधान सभा अन्तर्गत बुथ नंबर 214 पर डूप्लीकेट ईवीएम रखने की शिकायत जिला नियन्त्रण कक्ष में एक निर्दलीय प्रत्याशी के पोलिंग एजेंट द्वारा करायी गई थी। जिसे जॉचोपरान्त गलत पाया गया। जबकि बरबीघा के बुथ संख्या 153 बिहटा गॉव में ईवीएम मशीन के खराबी के कारण तकरीबन एक घंटे तक मतदान बाधित रहा जिसे बाद में पुन: ठीक कर लिया गया। शेखपुरा विधान सभा के मदारी गॉव के बुथ संख्या 79 पर निर्दलीय प्रत्याशी के सम्पर्क द्वारा एक दलीय प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करवाने का आरोप मतदान कर्मियों पर लगाया। वही शहर के बुथ संख्या 40 पर कई मतदाताओं के ईपीक मौजूद थे। लेकिन उनका नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के कारण उन्हें बिना मतदान किये बिना वापस लौटना पड़ा। जबकि बरबीघा विधान सभा अन्तर्गत अरसिया चक गॉव के मतदाताओं ने बुथ दूरी होने के कारण मतदान का बहिष्कार किया। मतदान को लेकर प्रत्येक गॉव और शहर में उत्सव नजारा दिख रहा था। जिसमें महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिसा लिया और उनकी लम्बी कतार देखी गई। जो घंटो धूप में खड़ी हो कर मतदान करने को आतुर थी। वहीं चौक-चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बुथों पर केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बलों के जवानों के साथ होमगार्ड की तैनाती की गई थी। वहीं शहर के साथ-साथ सभी ग्रामीण बुथों पर अर्द्धसैनिक बल के जवान गश्त लगाते दिखें। जैसे-जैसे दिन बढ़ता गया वोटरों की तादाद मतदान केन्द्र पर बढ़ती गई। 

जिला नियन्त्रण कक्ष में घनघनाती रही फोन की घंटियॉ।
शेखपुरा


जिले के शेखपुरा तथा बरबीघा विधान सभा क्षेत्र में शिकायतों को लेकर बनाया गया जिलों नियन्त्रण कक्ष में सुबह से लेकर देर शाम तक फोन की घंटियॉ घनघनाती रहे। जिनमें दर्ज कराये गये आधे से अधिक शिकायत की जॉच करने पर सत्यता से परे पाया गया।  शेखपुरा के बुथ नं0 30,62 एवं 66 पर पोलिंग पार्टी पर ही किसी विशेष प्रत्याशी को मदद करने की शिकायत दर्ज करायी गई। जबकि चकन्दरा से डूप्लीकेट ईवीएम से मतदान कराने की शिकायत दर्ज करायी गई। वही चांड़े गॉव में एक प्रत्याशी विशेष के समर्थकों के द्वारा मतदाताओं को वोट डालने से रोके जाने एवं बंधक बनाये जाने की शिकायत दर्ज करायी गई। 

बेखौफ होकर मतदाताओं ने डाले वोट, नहीं चली धमकी।
शेखपुरा


जिले के शेखपुरा विधान सभा क्षेत्र अन्तर्गत अरियरी प्रखण्ड के सुदूरवती पूर्व हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में मंगलवार को अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था के बीच बेखौफ होकर मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया। पूर्व में कारगिल के नाम से चर्चित इस इलाके के कई गॉवों के मतदाताओं को इस चुनाव के पूर्व भी मोबाइल फोन पर अपराधियों द्वारा धमकी दिये जाने के बाद भी इस अलाके में बेफिक्र होकर पुरूष और महिला मतदाताओं ने भाग लिया। बुथों पर महिलाओं की लम्बी कतारें देखी गई। हिंसा प्रभावित पूर्व ससबहना, बरसा, सुमका, कसार, महुएत, करीमाबीघा, जंगलीबीघा, ऐफनी, मनीपुर, चोरवर, कम्बलबीघा, घुसकुरी, ईशापुर, धनकौल चॉदीबृन्दाबन आदि गॉव के मतदाताओं ने अपराधियों के धमकियों से भयमूक्त होकर शान्तिपूर्ण। तरीके से अपने मत का प्रयोग किया। पहले इन गॉवों में दो गुटों के अपराधियों के बीच रक्तरंजित घटनाओं को अंजाम देकर अपनी ताकत का एहसास कराते रहे थे।

बगैर सुरक्षा घूमें अधिकारी।
शेखपुरा


जिले के शेखपुरा तथा बरबीघा क्षेत्र लिए तैनात सुपर जोनल प्रभारी डी.डी.सी. मो0 शाकिर जमाल तथा ए.डी.एम. महेन्द्र प्रसाद सिंह बगैर सुरक्षा व्यवस्था के विभिन्न मतदान केन्द्रों का निरीक्षण करने क्षेत्र का दौरा करते देखा गया। डी.डी.सी. एवं ए.डी.एम. की सुरक्षा का भार केवल उनके बॉडीगार्ड के भरोसे था। जिले के दोनों विधान सभा क्षेत्रों के कुल चार सौ बारह बुथों के लिए सुपर जोनल प्रभारी की जिम्मेवारी डी.डी.सी. को सौंपी गई थी। जबकि बरबीघा की जिम्मेवारी ए.डी.एम. को सौंपी गई थी। 

चार हिरासत में।
शेखपुरा, 



शेखपुरा शहर के इन्दाय मूहल्ला स्थित मतदान केन्द्र पर व्यवधान उत्पन्न करने के मामले में पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में ले लिया है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि इन्दाय मतदान केन्द्र पर हिरासत में लिये जाने वालें में वार्ड पार्षद गंगा यादव, विनोद यादव, कलेश्वर यादव, तथा तपेश्वर सिंह का नाम शमिल है। पुलिस के अधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इन्दाय मतदान केन्द्र पर बाहर से मतदाता को लाकर मतदान केन्द्र में पहले वोट डलवाने को लेकर व्यवधान उत्पन्न करने के मामले में इन चार लोगों को हिरासत में लिया गया है।

बोगस वोटिंग से आक्रोशित लोगों ने ई.वी.एम. मशीन तोड़ा। 
घंटों मतदान बाधित, हुसैनाबाद गॉव में घटी घटना 6 हिरासत में।
शेखपुरा, 


शेखपुरा विधान सभा क्षेत्र के अन्तर्गत हुसैनाबाद गॉव में मतदान केन्द्र पर तैनात एक महिला कर्मी द्वारा बोगस वोटिंग करवाने को लेकर आक्रोशित लोगों द्वारा ईवीएम मशीन को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए छह लोगों को हिरासत में लिया है। जबकि अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस बल छापेमारी कर रही है। सूत्रों ने बताया कि हुसैनाबाद गॉव स्थित बुथ संख्या 123 पर पर्दानशीं वोटरों की पहचान के लिए तैनात महिला कर्मी द्वारा बोगस बोड डलवाया जा रहा था। जिससे आक्रोशित लोगों ने मतदान केन्द्र से ईवीएम मशीन को ले भागा, तथा क्षतिग्रस्त कर उसे तालाब के किनारे फेंक दिया। जिसे बाद में मतदान कर्मियों द्वारा बरामद कर लिया गया। इस घटना के उपरान्त डी.एम. धर्मेन्द्र सिंह एवं एस.पी. कुंवर सिंह घटना स्थल पर छानबीन की। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई कर छह लोगों को हिरासत में ले लिया है। ईवीएम को क्षतिग्रस्त करने के कारण हुसैना वाद मतदान केन्द्र संख्या 123 पर घंटों मतदान बाधित रहा। बाद में नया ईवीएम मशीन उपलब्ध करवाये जाने के बाद पुन: मतदान को चालू कराया गया।

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच 51   प्रतिशत मतदान, शेखपुरा में      प्रतिशत 52 तथा बरबीघा में 51    प्रतिशत मत पड़े। 
शेखपुरा


मंगलवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शेखपुरा विधान सभा क्षेत्र के दो सौ पन्द्रह बुथों पर 52    प्रतिशत मत डाले गये। जबकि बरबीघा विधान सभा क्षेत्र अन्तर्गत एक सौ बानबें बुथों पर मत डाले गये जिले के दोनों विधान सभा मिलाकर कुल  51  प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। कुल चार सौ बारह बुथों पर मतदान कराने को लेकर प्रशासन द्वारा भूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था का इन्तजाम किया गया था। जहॉ मतदाताओं ने निभीZक होकर अपने मत का प्रयोग किया सुबह ग्यारह बजे तक शेखपुरा विधान सभा क्षेत्र अन्तर्गत 15 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मतदान का प्रयोग किया था। जबकि बरबीघा विधान सभा क्षेत्र अन्तर्गत 15 प्रतिशत मत का प्रयोग मतदाताओं ने किया। वही दिन बढ़ने के साथ ही मतदान करने वालों की तादाद भी बढ़ती गई। मतदान सम्पन्न होने के साथ शेखपुरा विधान सभा के 12 तथा बरबीघा विधान सभा के ग्यारह प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम मशीन में कैद हो गई। मतदान समाप्ति के बाद ईबीएम को बज्रगृह में लाने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। दोनों विधान सभा के लिये वज्रगृह जवाहर नवोदय विधलय के कक्ष में बनाया गया है। छिटपुट घटनाओं को छोड़कर मतदान शान्ति पूर्वक सम्पन्न हो गया। लोकतन्त्र के इस महापर्व में महिलाओं ने पुरूषों से बढ़चढ़ कर भागेदारी निभायी। मतदान की गणना 24 नवम्बर को जवाहर नवोदय विधालय स्थित बहुउद्देश्यीय कक्ष में कराया जायेगा। 

मैनेजमेन्ट पर मतदाता भारी।
शेखोपुरसराय,

शेखोपुरसराय प्रखण्ड के अधिकांस मतदान केन्द्र संवेदनशील रहने के कारण चाक-चौबन्ध सुरक्षा व्यवस्था के बीच मतदाताओं ने निभिZक होकर अपने-अपने मतों का प्रयोग किया। सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी की परिन्दा भी पर नहीं मारे और बोगस वोटर का होस क्या कि सोच भी सके यही कारण था कि सारे बुथों पर सुबह से ही क्या पुरूष क्या महिला सभी सारे काम छोड़ कर अपना मतों का प्रयोग के लिए लम्बी लाइन में डटे नज़र आए कहीं महिलाए अपने दुधमुहें बच्चों को लिए लम्बी करात में खड़ी नज़र आई तो कहीं बूजूर्गों ने पूरे श्रद्धा के साथ अपने मत डाले, वोट के ठेकेदारों की एक भी नहीं चली मतदाता यही कहते नज़र आए कि बड़ी आराम से वोट डाले। रात-रात भर घुम कर सेेटिंग-गेटिंग करने वालों कि मतदाताओं ने सारे समीकरण तोड़ डाले।  जैसा कि लोगों से जानकारी मिली उससे तो थोड़ा-बहुत नज़र जो आ रहा था वह जाती समीकरण तो हावी रहा ही और कहीं भी कोई अप्रिय घटना या झड़प की घटना सुनने को नहीं मिली। बारह बजे के बाद तो कहीं-कहीं मतदान केन्द्र शान्त नज़र आया इस बार वोटर कि धाक रही वोट के ठेकेदार की तो हवा ही निकल गई।  

लोकतन्त्र के महापर्व में मतदाता की जय।
बरबीघा
लोकतन्त्र का महापर्व लोगों कें उमंग के साथ ही सम्पन्न हो गया। कहीं बुढ़ी महिलाओ ं का हौसला देखने को मिला तो कहीं पैर में प्लास्टीर भी वोट में बाधा नहीं बना सका। लोकतन्त्र के इस महापर्व में छिटपुट घटनाओं को छोड़ शान्तिपूर्ण मतदाना में लोगों का भी सहयोग मिला। सबसे पहले बुथ नं 12 सरैया में मुखीया रूणीया देवी का नाम सहित 100 से अधिक लोगों का नाम काट दिए जाने के बाद लोगों ने जम कर हंगामा किया। वहीं बुथ संख्या 11 में लंबी कतार लगा कर लोग वोट देते नज़र आये। बहीं एक निर्दलीय प्रत्याशी का पर्चा इबीएम मशीन के पास देखा गया। बरबीघा विधान सभा के कासीबीधा बुथ पर भी महिलाओं की कतार दिखी वहीं तेउस बुथ पर महिलाओं की उमंग सामने आ रही थी। बुथ संख्या 131 लोदीपुर में पीठासीन पदाधिकारी पर लोगों के द्वारा धिमीगति से मतदान कराने का आरोप लगाया गया। जबकि बरबीघा नगर क्षेत्र के असीयाचक गांव कें लोगों ने बुथ संख्या 59 पर बोट का बहिस्कार किया। गांव वालों का आरोप था कि गांव का विकास नहीं हो सका है।

लोकतंत्र का महापर्व














रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...