30 दिसंबर 2012

एक पत्रकार का अपहरण (आपबीती)-अन्तिम कड़ी।


दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंढ और रात भर खुले आसमान में मीलों चलने के बाद कैसी हालत होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। जिंदगी और मौत से जद्दोजहद में आज न आग प्यारी लग रही थी और न ही ठंढ सता रही थी। हमेशा दिमाग में तरह तरह के ख्याल आते रहते और यूं ही सोंचते हुए करीब एक धंटा बीता होगा तब जाकर दोनों मुखिया से लौट आए। आते ही दोनों साथियों को जगाया और अलग हटकर खुसुर फुसुर करने लगे। फिर सरदार ने आकर हमसे बात की। मैंने खर्राटे ले रहे मित्र को जगाया और सरदार की बोलने की टोन बदली हुई थी। वह हमदोनों को समझाने लगा। 
‘‘देख भाय, जे होलौ उ मनेजर के गफलत में, हमसब ओकरा उठावे बला हलियो पर एक नियर गाड़ी होला से गड़बड़ हो गेलो, सेकरासे अब जे होलो से होलो छोड़ तो देबौ पर पुलिस के चक्कर में मत फंसाईहें।’’
समझ गया कि छोड़ने का मन बना लिया है पर कहीं पुलिस के पास न चला जाउं इसलिए डर रहा है। मैं फिर उससे अत्मियता दिखाते हुए बतियाने लगा।
‘‘देखो दोस्त, हमरा ले तों भगवान हा और हम पुलिस के पास काहे जाइबै, तो की कैला हमरा।’’
मैं उसे विश्वास दिलाने लगा कि मैं पुलिस को उसके बारे में कुछ नहीं बताउंगा और न ही किसी प्रकार की उससे नाराजगी है। यह करते कराते काफी समय बीत गया। उसे हमदोनों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। फिर मैंने मनोज जी को टहोका और उन्हांेने ईसारा समझ उसे भरोसा दिलाने लगे कि जो हो हमलोग आपके साथ रहेगे।
फिर समय आया भरत मिलाप का। विदाई का वक्त ऐसा भारी पड़ा जैसे राम को जंगल छोड़ने के समय भरत पर भारी पड़ा हो। सचमुच हमसब भावुक हो गए थे। वे सब हमे छोड़ने वाले थे यह विश्वास हो गया था फिर भी हम यहां से जल्दी निकल जाना चाहते थे। अब समय था जुदा होने का और इस समय मैं भावनाओं को रोक नहीं सका। विश्वास ही नहीं हो रहा था हमलोग जिंदा घर जानेवाले है। मैं रोने लगा। फूट फूट कर रोने लगा। और फिर सरदार से लिपट गया। वह भी भावों में बह गया। रोने लगा। फिर मनोज जी भी भावुक हो गए। हमलोग बारी बारी सबसे गले मिल लिए। 
हमलोग वहां से जाने लगे। थोड़ी दूर बढ़ा ही था कि ‘‘रूको’’ की आवाज सुनाई दी। फिर से डर गया। हमलोग रूके तो सरदार ने आकर कहा कि उसके साथी आपके पैसे लेने के लिए कह रहे है। क्या करे वे लोग नहीं मान रहा। साला कमीना छोड़ने के लिए बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ है। मैं तो यह नहीं कर सकता इसलिए जो जेब में थोड़ी बहुत हो तो दे देंगें तो उनलोगों को तसल्ली हो जाएगी।
फिर मनोज जी ने उपर की जेब से जो भी रखा था निकाल दे दिया। फिर उसने उनके घड़ी की तरफ ईसारा किया और उन्होने घड़ी  निकाल कर दे दिया। मैंने भी वहीं किया तो भी जेब में था दे दिया। मनोज जी के उपरी जेब में चार सौ और मेरे पास सौ रूपये थे। दोनों वहां से निकल गए। 
वहां से निकलने के बाद भी यकीं नहीं हो रहा था कि उन्हांेने हमें छोड़ दिया है। लगता रहा कि पीछे से आऐगें और गोली मार देगें। धुप्प अंधेरे में चलता जा रहा था। न रास्ते का पता चल रहा था, न किसी गांव का। रास्ते में कोई चीज खड़ी होती तो लगता वही लोग खड़े है।
खैर करीब एक धंटा चलने के बाद कुत्तों के भौंकने से यह आभास हो गया कि आसपास एक गांव है और हमलोग उधर ही चल दिए। कुछ दूर चलने के बाद एक गांव मिला। हमलोग घरों का दरबाज खटखटाने लगे पर किसी ने दरबाजा नहीं खोला। पूरा गांव घूम गया। अंत में एक दालान पर कुछ लोग पुआल बिछा कर बाहर ही सो रहे थे। हमलोगों ने जगाया। अब उनलोगों ने जब पूछा कि कहां घर है, कहां से आए हो तो अकबका गया। नवर्स तो थे ही कुछ बताना भी जरूरी था जिसपर उन्हें भरोसा हो जाए। बताया कि पटना से आ रहे थे रास्ते में नशाखुरानी का शिकार हो गया और फिर रेल से फेंक दिया गया और रात भर भटकते भटकते यहां पहूंच गया। रामा। ठंढ़ से देह थर्रथराने लगा। लगा जैसे रात भर की ठंढ अभी अभी सिमट आई है। पूरा देह बर्फ की सिल्ली की तरह जमने सा लगा था। दोनों वहीं पुआल पर बैठ गए। पैर में ठेहुंना तक कादो लगा हुआ था। लोगों ने पंडित जी कह कर घर वालों को जगाया। पंडित घर से निकले। गांव का नाम पूछा तो बताया गया, यह पटना जिले का बाढ़ थाना के अजगारा गांव है। बाढ़ का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। कुख्यात अपराधी सरगना अनन्त सिंह का ईलाका। यहां तो दिन में भी मार कर फेंक देगा और पता नहीं चलेगा। 
खैर, पंडित जी का पूरा परिवार जाग गया। बहुत अफसोस जताते हुए पंडित जी ने आश्रय दे दिया। ओढ़ने के लिए एक कंबल भी दे दी। रात के लगभग तीन बजे थे। अभी सुबह होने में दो तीन घंटे बाकी थे। पंडित जी की पत्नी ने चाय लाकर दिया और गर्म चाय ऐसे गले में उतर रही थी जैसे अमृत।
अजीब आफत है। रात भर नींद नहीं आई। लगता रहा कहीं से कोई आया और हमे पकड़ ले जाएगा। खैर, सुबह हो गई। बस पकड़ कर बाढ़ आ गया और फिर सबसे पहले घर पर टेलीफोन किया। जनता था सब परेशान होगें। फिर बाढ़ से बस पकड़ कर घर के लिए चल पड़ा। मनोज जी के पास पैसे थे। उन्होने बताया कि उनकी पिछली जेब में दो हजार रूपये थे जिसे उन्होने छुपा कर रखा था।
ओह, घर आया तो यहां का नजारा भी बदला बदला हुआ था। कई तरह की चर्चाऐं हो रही थी पर कुछ दिल को दुखाने वाली बातें भी सामने आई। मैं अपने घर गया। पत्नी का बुरा हाल था। मुझसे लिपट कर रोने लगी। फिर उसने जो बताया वह कलेजा चाक करने वाला था। उसने बताया कि जब उसे खबर मिली तो वह मनोज जी के डेरा जाकर जानना चाहा कि क्या हुआ तो उनकी पत्नी ने ऐसा व्यवहार किया जैसे उनका अपहरण मैने ही करबा दिया हो। 
देवा, कैसे कैसे दिन दिखाते हो। इस बीच कई बातों की जानकारी मिली। यह कि मेरा छोटा भाई बरूण को जब इसकी जानकारी मिली तो उसने यह पता लगा लिया कि अपहरण करने वाला सरदार तोरा गांव का संजय यादव है। वह अपने साथियों के साथ संजय यादव के घर पर जा धमका और धमकाया। भैया को कुछ हुआ तो पूरे परिवार को खत्म कर देगें। फिर उसे वहां से छोड़ देने का आश्वासन मिला। और अन्त में दुख हुआ तो यह कि उस दिन के अखबार में एक कॉलम की खबर भर छपी थी पत्रकार का अपहरण। वह भी स्थानीय पत्रकार मित्रों के सहयोग से। अखबार के लिए यह और लोगों की तरह ही एक खबर भर थी। हाय रे। जिसे अपना समझ रहा था वही अपना नहीं।
खैर इस बीच साल दर साल बीतते गए और फिर बिहारशरीफ कोर्ट से नोटिस आया कि अपहरण कांड में गवाही देनी है। संजय यादव कई कंडों में पकड़ा गया था। दोनों ने जाकर गवाही दे दी कि संजय को नहीं जानता। अपना फर्ज निभाया। बहुत मंथन करता रहा कि गवाही दें की नहीं। पर संजय के व्यवहार और उससे किए गए वादों ने गवाही दिलबा दी।
वहीं पिछले चुनाव में संजय यादव पंचायत चुनाव में मुखिया के लिए चुनाव लड़ने की योजना बनाई और फिर अखबार में खबर छपी की सरमेरा में गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई।
आज तीस तारीख है और इस बात को याद करते हुए जिंदगी कई रंग दिखा देती है। अपराधियों का सच और जिंदगी की हकीकत, सबकुछ....

28 दिसंबर 2012

एक पत्रकार का अपहरण (आपबीती)---3


दिसम्बर की सर्द रात को कोहरे ने अपने आगोश में ले लिया था और हमारे प्राण को अपराधियों ने अपने आगोश में। जिंदगी और दोस्ती की बाजी में मैंने जिंदगी को दांव पर लगा दिया। मैं उसे यह समझाता रहा है कि हमलोग पत्रकार है और हमारा अपहरण करने से कोई फायदा नहीं होगा। जान भी मार दोगे तो क्या मिलेगा? फिर बॉस ने अपने एक साथी को बुलाकर आदेश दिया। 
‘‘चलो काम खत्म करो यार, कहां ढोते रहोगे। खत्म करदो यहीं।’’ देशी पिस्तौल की ठंढी नली कनपटी पर आकर सटी तो मेरे जैसे अर्ध-आस्तिक के पास भी ईश्वर को याद करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। हे भोला। जीवन के अच्छे-बुरे कर्म तरेंगन की तरह आंखांे के आगे नाचने लगे। बुरे कर्मों को अच्छे कर्मों से संतुलित करने लगा पर पलड़ा बुरा का आज शायद भारी था इसलिए तो मौत सामने खड़ी थी और मैं जिंदगी से हिसाब किताब कर रहा था। खुद के बारे में सोंचने लगा। परिवार का क्या होगा? किसी का सहारा भी तो नहीं। एक छोटा भाई है बस। किसी तरह की जमा पूंजी तक नहीं। ईश्वर को याद करता हुआ उनसे बतियाने लगा। जैसे कि वह सामने हो और सब कुछ उनकी मर्जी से हो रहा हो। अपने अच्छे कर्माें की दुहाई भी देता तब बुरे कर्म सामने आ जाता। देवा। शायद मौत के आगोश में ही जिंदगी की हकीकत सामने आती है। गीता का वचन, कर्म प्रधान विश्वकरि राखा याद आने लगा। कोई जैसे पूछ रहा था 
‘‘बताओ क्या किया इतने दिनो’’ और मैं जबाब दे रहा है। इसी तर्क वितर्क में कट की आवाज ने बुरे कर्म की प्रधाना बता दी, गया, पर नहीं, यह पिस्तौल के बोल्ट के चढ़ाने की आवाज थी।
‘‘रूको’’, बॉस की यह आवाज जैसे ईश्वर का आदेश हो। ‘‘चलो इसको लेकर चलते है।’’ सफर फिर से प्रारंभ हो गया। सर्दी की यह कंपकंपा देने वाली रात आज डरावनी नहीं लग रही थी और न ही अब मौत का डर लग रहा था। पता नहीं क्यों मौत की आगोश में होने के बाद उसका डर खत्म सा हो गया था या यूं कहें कि सोंच लिया था कि जब मरना ही है तो मरेगे, पर मैंने जिंदगी का दामन नहीं छोड़ा। ऐसे समय में आचार्य रजनीश की बातें याद आने लगी। 
‘‘मौत तो सुनिश्चित समय पर एक बार आनी तय है इसलिए उसके भय से बार बार नहीं मरना।’’
और मैं फिर मौत से बतियाने लगा।
‘‘काहे ले हमरा अर के मारे ले कैलो हो, जिंदा रहबो त कामे देबो।’’ मैं समझाने के विचार से बोला।
‘‘की काम देमहीं।’’
बातचीत प्रारंभ, मैं यह समझाने की प्रयास करने में सफल हो रहा था कि हमलोग समाज से तुम्हारी तरह ही लड़तें है। अन्याय का विरोध करते है। सफर में बातचीत का सिलसिला चलते चलते लगा जैसे दो मित्र आपस में बात कर रहे हो। मैं मनोविज्ञान के लिहाज से उसका आत्मीय होने का प्रयास करने लगा। फिर एकएका मुझे कंपकंपी लगने लगी। हाफ स्वेटर पर ठंढ बर्दास्त नहीं हो रही थी औंर मैं कंपाने लगा। तभी मेरे देह पर एक चादर आ कर रखा गया। 
‘‘ ला ओढ़ो, हम कोट पहनले हिए।’’ बॉस से युवक ने अपने देह से चादर उतार कर मेरे देह रखते हुए कहा। देवा। मौत को भी संवेदना होती है? और बोलते बतियाते हमलोग चलते रहे। इस बीच सभी का व्यवहार अब पहले जैसा नहीं रहा, थोड़ आत्मीय हो गया। रास्ते में कहीं झाड, तो उंचे उंचे टीले मिले। हमलोग चलते जा रहे थे। तभी रास्ते में बड़ी सी नदी मिली। सब मिलकर पार करने की सोंचने लगे। ‘‘पानी अधिक नहीं है पार हो जाएगें।’’ एक ने प्रवेश कर देखते हुए कहा। फिर जुत्ता, मौजा हाथ में और हमलोग पानी मे। 
नदी में पानी कम और कीचड़ ज्यादा दी। भर ठेहूना कीचड़ में धंसता हुआ जा थे। उस पार दूर एक गांव के होने का आभास हुआ। कुत्तों ने भौंकना प्रारंभ कर दिया था। थोड़ी ही दूर चलने पर नदी के अलंग पर ही एक धान का खलिहान मिला। हमलोग वहीं बैठ गए। कारण हमलोगों से ज्यादा उसमें से एक की हालत ठंढ से ज्यादा खराब थी। सब लोग वहीं बैठ गए। आलम यह कि उपरी तौर पर हमलोग आपस में धुलमिल गए थे। बोल-बतिया ऐसे रहे थे जैसे वर्षों पुराना मित्र। उनलोगों को विश्वास में ले लिया कि यदि मुझे छोड़ दिया तो किसी प्रकार का खतरा नहीं होगा। पुलिस को भी कुछ नहीं बताएगे।
फिर उसमें से एक ने मचिस निकाली और नेबारी लहका दिया। सब मिलकर आग तापने लगे। फिर थोड़ी देर के बाद बॉस ने कहा कि चलो मुखिया जी से चलकर आदेश ले लेते है कि क्या करना है, मारना है कि छोड़ना है। और फिर दो साथी उस गांव की ओर चल दिए जिधर से कुत्तांे के भौंकने की आवाज आ रही थी। दो ने अपने हाथ में पिस्तौल निकाल लिया, 
‘‘कोई होशियारी नै करे के, नै ता जान यहां चल जइतो।’’
‘‘नै नै होशियारी की, जे तोरा करे के हो करो, हमरा ले भगवान तोंही हा, मारे को मारो, जियाबे के हो जियाबो।’’
फिर धीरे धीरे आग लहकता रहा और सबकी आंखों में नींद नाचने गली। दोनों अपराधियों को नींद ने अपने आगोश में ले लिया। एक की पिस्तौल वहीं रखी हुई थी। पर मैं बेचैन हो रहा था। मेरे मन में यहां से भागने का ख्याल आने गला। पिस्तौल को अपने कब्जे में लेकर यहां से भाग सकते है? पर मेरे मन की यह बात यहीं दबी रह गई। मेरे मित्र मनोज जी के खर्राटे की आवाज ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया। यदि मैं भागने की या इनको जगाने की कोशीश करता हूं तो यह लोग भी जाग जाएगें और फिर खेल खत्म.....

अंतिम कड़ी 30 दिसम्बर को.....

21 दिसंबर 2012

एक पत्रकार का अपहरण-(आपबीती)-(2)


फिर अपराधी दोनों को कुछ दूर खेतों में ले गए और पूछ ताछ करने लगे। उनमें से एक मनोज जी को गलियाने लगा।-
‘‘साला, बड़का मैनेजर बनता है, बैंक में लौन लेने के लिए जाते है तो टहलाता है, बाबा बनता है, अब बताओ।
उसकी बातों से लगा कि वे पीएनबी बैंक का मैजेनर समझ कर दोनों का अपहरण किया है। यह बात भी समझ आ गई कि ये लोग मुझसे तुरंत पहले निकले मैनेजर का अपहरण करना चाहते थे पर एक ही रंग की गाड़ी दोने की वजह से कन्फयुज कर गए। 
खैर, हमदोनों पहले अपना अपना परिचय दिये और बताया कि हम बैंक मैनेजर नहीं हैं पर उनको मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ। चुंकि मेरे मित्र बढ़िया जैकेट, घड़ी और चश्मा लगाए हुए थे सो उनको लगता था कि यह मैनेजर ही है। फिर वहां से थोड़ी दूर खंधा में हम दोनों को बुलाते हुए ले गया और एक उंचे अलंग के नीचे सब मिलकर बैठ गया। मैंने गौर किया कि चार तो मेरे साथ थे पर एक हमलोगों से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था। हमलोग अपने पत्रकार होने का परिचय भी दिया पर वे लोग मानने को तैयार नहीं थे। अब दोनों के पास कोई चारा नहीं था। मनोज जी कुछ बोलना चाहे तो फिर पिस्तौल की बट से मार दिया। वे नर्वस हो गए। पर मैं समझ गया कि ये लोग अपराधी है और अब धैर्य के अलाबा कोई चारा भी नहीं, सो मैं उनमें से एक, जो देखने में थोड़ समझदार और संस्कारी लगता था, बतियाने लगा। मैंने अपना पूरा परिचय सही सही दिया। उसके एक मित्र के बारे में भी बताया कि जो  अपराधी गतिविधियों में शामिल रहता था और मेरे गांव का था। उसने उसे पहचाना। धीरे धीरे अंधेरा घिरने लगा। सड़कों पर केवल गड़ियों के चलने की आवाज और लाइट दिखता था। दिसम्बर का महिना था और मैने केवल हॉफ स्वेटर पहन रखा था सो ठंढ़ से कंपकपाने गला। फिर सबने दोनों को चलने के लिए कहा। खंधा में खेते-खेते हमलोग चलते रहे। कहीं चना के खेत में बड़े बड़े मिट्टी के टुकड़ों पर चलना पड़ा तो कहीं बीच में गेंहू के पटवन किए खेत के कीचड़ से होकर गुजरना पड़ा। हमलोग लगातार तीन चार धंटा तक यूं ही चलते रहे। इस दर्दनाक और डरावनी सफर में मुझे लगा की शायद अब दोनों का आज अंतिम दिन है। इस बीच मनोज जी थक गए और चलने से इंकार कर दिया। तभी उनमे से एक भददी भददी गलियां देते हुए उनको मारने लगा। फिर सबने मिलकी आपस में बात की और कहा कि दोनों को खत्म कर दो, कहां ले जाते रहोगे। दो युवकों ने पिस्तौल तान दी। इसी बीच मैंने साहस का दामन नहीं छोड़ा और उसके सरदार की तरह लगने वाले युवक से बातचीत प्रारंभ कर दी। बहुत आरजू मिन्नत करने के बाद वह थोड़ा समझा और साथियों को रोक दिया। दोनों ने राहत की सांस ली। इसी बीच मनोज जी के पैर में बाधी (मांसपेसियों में खिंचाव ) लग गई और वह गिर गए। मैने झट उनके पैर को सहलाते हुए उनको सहारा दिया। अपराधियों को लग रहा था कि वह नकल कर रहे हैं। खैर मैने कंधे का सहारा दे उनको लेकर चलने लगा। बीहड़ माहौल। दूर कहीं कहीं किसी गांव के होने का अभाव कुत्तों के भौंकने की वजह से ही होती थी या कहीं कहीं किसी गांव मंे एक-आध लालटेन के जलने की वजह से। एक बात महसूस किया कि गांव से थोड़ी दूर पर ही होता था कि गांव में कुत्ते भौंकने लगते और फिर गांव का अभास मिलते ही अपराधी रास्त बदल देते।
सफर जारी था और बातचीत का सिलसिला भी। इसी बीच सरदार की तरह लगने वाला युवक बड़ा आत्मीय ढ़ग से बातचीत करने लगा। मनोज जी ने साहस छोड़ दिया था। जो हो, मारना हो तो मार दो। हमलोग बस चलते ही जा रहे थे। बातचीत में युवक को मैंने कुरेदना प्रारंभ कर दिया। 
मैंने कहा कि मैं पत्रकार होकर जुल्म के विरोध मंे ही आवाज उठाता रहा हूं और जानता हूं कि अपराधी मजबूर होकर ही अपराध करते है। मेरी बात उसे चुभ गई। फिर उसने अपनी दारून कथा सुनाई। कैसे रोजगार की तलाश में वह भटकता रहा। कैसे रोजगार के लिए बैंक से लॉन लेने के लिए वह लगातार बैंक का चक्कर लगाता रहा है और बैंक ने लॉन देने से मना कर दिया। मैनेजर तो मिलने तक को तैयार नहीं हुआ। बातें होती रही और हमलोग चलते रहे। फिर जब वे लोग थक गए तब जाकर एक स्थान पर बैठ गये। उस युवक ने मुझे थोड़ी दूर साथ चलने की बात कही। मैं सहम गया। शायद मुझे एकांत में लेजाकर मार देगा? 
पर नहीं वह मुझसे मेरे मित्र के बारे में पूछने लगा।
‘‘लगो है इ कोई बड़का आदमी है? बता दे तो तोरा छोड़ देबौ।’’ उसने अब अपनी मगही भाषा का प्रयोग किया। देवा। मनोज जी टीवीएस शो रूम के मालिक थे, इस लिहाज से यदि यह बात उसे पता लग जाती तो निश्चित ही वह उन्हें पकड़ के ही रख लेता। वह शातीर भी था जो मुझे छोड़ देने का प्रलोभन देने लगा। मैं उसे समझाता रहा है कि यह पटना से थक हार कर बरबीघा आ गए है और अखबार का एजेंट तथा पत्रकार है। वह मानने को तैयार नहीं हुआ और मेरी देस्ती की परीक्षा लेने लगा।
देवा, दोस्ती बचाउं की जान..........

जारी है...

19 दिसंबर 2012

एक पत्रकार का अपहरण-(आपबीती)-1


30 दिसम्बर 2006 की वह काली शाम जब भी याद आती है मन सिहर जाता है। उस रात बार बार मौत ऐसे मुलाकात करके गई मानों रूठी हुई प्रेमिका को आगोश में लेने का प्रयास कोई करे और वह बार बार रूठ जाए। 
समय करीब चार बजे थे। नालन्दा जिला के सरमेरा प्रखण्ड से प्रभात खबर अखबार के लिए रिर्पोटर तथा एजेंट खोजने गए थे। उस समय पत्रकारिता का नया नया जोश था, सो अखबर के अधिक से अधिक बिक्री हो इसके लिए अपने मित्र मनोज कुमार को पर्टनरशिप पर एजेंट बनबा दिया। उस समय अखबार लगभग लॉन्च ही हुई थी। यहां बिक्री नही ंके बराबर थी और इसीलिए जुनून में आकर मोटरसाईकिल पर धूम-धूम कर अखबार का ग्राहक बनाया, सुबह सुबह कई धरों में भी अखबार पहुंचाया। पूरे शेखपुरा जिला का एजेंसी लिया था सो अखबार की बिक्री बढ़ाने के लिए मेहनत कर रहा था। इसी सिलसिले में सरमेरा जाना हुआ। लौटते लौटते चार बज गए। 
रास्ते भर आदतन हंसी मजाक करते हुए दोनों मित्र लौट रहे थे तभी तीन-चार किलोमीटर दूर जाने के बाद गोडडी गांव के पास मैने मोटरसाईकिल रोकने का आग्रह किया। लालू यादव के सरकार का अभी ताजा ताजा ही पतन हुआ था सो अपराधियों का आतंक और भय बरकरार था। मैंने कहा-
‘‘रोको जरी गड़िया, पेशाव कर लिऐ।’’
‘‘घुत्त तोड़ा तो कुछ डर-भय नै हो, क्रिमनल के ईलाका है कहीं कोई अपहरण कर लेतो तब समझ में आ जाइतो।’’
‘‘धुत्त छोड़ो ने, हमरा अर के, के अपहरण करतै, लपुझंगबा के।’’
और मोटरसाईकिल रोक दिया गया। हमदोनों फारिंग हुए। उन दिनों बरबीघा-सरमेरा सड़क की हालत एक दम जर्जर थी। सड़क कम और गड्ढे ज्यादा थे। इसी वजह से बहुत कम बसें चलती थी। जैसे ही हमलोग मोटरसाईकिल पर चढ़ने लगे कि सेम कलर, सेम मोडल तथा सेम कलर का एक मोटरसाईकिल पर दो लोग बगल से गुजरे। नंबर प्लेट पर मेरी नजर गई तो पंजाब नेशनल बैंक लिखा हुआ था। उस पर भी दो लोग सवार थे। 
‘‘देखो, ऐकरा अर के  अपहरण करतै कि हम गरीबका के।’’-मैंने कहा और फिर वह मोटरसाईकिल मुझसे थोड़ी आगे निकल गई। मनोज जी ने  बताया कि यह सरमेरा पंजाब नेशनल बैंक का मैनेजर है। दोनों इसी चर्चा में मशगुल थे कि कैसे कोई इसका अपहरण नहीं करता। उन दिनों अपराधियों का बोलबाला था। कुख्यात डकैत कपिल यादव ने कुछ दिन पहले ही मेंहूस रोड में दो लोगों को बस उतार कर आंखें फोड़ दी थी।
खैर, हमदोनों निश्चिंत भाव से बोलते-बतियाते, हंसी मजाक करते हुए चले जा रहे थे। मैनेजर की मोटरसाईकिल आगे निकल गई। तभी अचानक तोड़ा गांव के पूल के पास  पहूंचते ही तीन-चार लोगों मोटरसाईकिल के आगे पिस्तौल तान कर खड़ा हो गए। हमदोनों कुछ समझ पाते कि तभी मनोज जी के सर पर पिस्तौल की बट से मारना प्रारंभ कर दिया। फिर दोनों मोटरसाईकिल से उतर गए। अभी तक किसी भी प्रकार के अनहोनी की आशंका नहीं थी। पर तभी दोनों को सड़क के नीचे खेतों में पिस्तौल की बट से मारते पीटते ले जाने लगे। पहले तो लगा कि शायद लूटरें हो, पर जब खेतों में कुछ दूर ले जाकर सवाल जबाब करने लगा तो हम दोनों समझ गए कि दोनों का अपहरण कर लिया गया.....

जारी है...

11 दिसंबर 2012

सुखल फुटानी


उर्वरक की कालाबाजारी एक गंभीर समस्या है। पिछले साल इसका बड़ा ही कड़बा  अनुभव रहा है। जितनी बार खबर लगी, पदाधिकारी ने छापेमारी की उतनी ही बार उर्वरक का मुल्य और बढ़ गया। एक मित्र ने उस समय व्यंग किया - ‘‘क्या हुआ जितनी बार अधिकारी ने पैसा खाया, उतनी बार दाम को बढ़ा दिया गया। तुम्हीं मैनेज हो जाते तो क्या होता? खाली सुखले फुटानी से काम चलेगा।’’ 

अभी 280 का युरिया 370, 1000 का डीएपी 1600, 900 का एनपीके 1300 में बिक रहा है। सबकी चांदी है।

इस बार उर्वरक के थोक माफिया के द्वारा विज्ञापन देने का प्रलोभन दिया गया। मन भी डोल रहा है। असमंजस में हूं क्या करू? विज्ञापन ही हम जैसे छोटे रिर्पोटरों का मापदण्ड है। 

सांप छुछुंदर का हाल है-निगलो तो अंधा, उगलो तो कोढ़ी....

09 दिसंबर 2012

कांग्रेसी राम राज और विदेशी मोदीखाना। (चुटकी)


आज समाजवादी झंडा ढोने वाला ढोलक यादव बहुत प्रसन्न था। नेताजी ने मैडम का पानी उतार दिया। एक दम गरमा-गरम बहस। ई विदेशी मोदीखाना किसान विरोधी है मैडम इसे वापस ले लिजिए।

गौरी बा के दलान पर घूरा (अलाव) तापते हुए पहले ढोलक उदास रहा करता, मंहगाई के मुददे पर जब भी बहस होती तब वह चुप हो जाता। बोलता भी क्या? कल ही नयकी भौजी झगड़ पड़ी थी,
‘मुंहझौंसा परबो-तेउहार में गरम-मशाला रोजी नै है।’’ तब मोदीखाना से उधार लाकर गरम-मशाला दिया था ढोलक ने। मंहगाई की मार से वह लाचार था और उसके नेताजी सरकार के साथ। सोचता ढोलक कि अपन हारल और मौगी के मारल केकरा से कहे।
‘‘कि हो काका, बोलो हलियो ने हमर नेता जी किसान के रखबाला हखिन, देख लेलहो।’’ मंडली में आज सब चुप थे और ढोलक ढकर रहा था। आज ही वह अखबार में नेताजी का भाषण पढ़ा है, लाइन बाई लाइन।
तभी शाम के साढ़े सात बज गया। सुरो बाबू का बाजा चालू हो गया। यह आकाशवाणी है। आज का प्रमुख समाचार, बहनजी और नेताजी की मदद से एफडीआई पास हो गया।
ढोलक अवाक। इ तो गिरगिट की तरह पलट गया। बहिनजी और नेताजी दुनु एक साथ? हे भगवान ई का हो रहा है। घोर कलजुग आ गया कलजुग।
‘‘कलजुग नै ढोलक, राम राज है राम राज। बाघ-भैंसा दुनु एक्के घाट पर। इस सब मैडम के प्रताप है। ’’ बधोरन काका बोल उठे।
तभी बहिनजी के एक समर्थक रमेसर सिंह रविदास ने प्रतिकार किया।
‘‘देखिए यह बस गरीबों के हित का बात होगी तभी बहिनजी ने सरकार का साथ दिया है। आप लोग कुछो कहिए पर बहिनजी जी ने यदि साथ दिया है तो जरूर गरीब का भला होगा, सौ परसेंट गारंटी है।’’
पर ढोलक खामोश वहां से उठ गया। कैसे नेताजी लोहिया जी, समाजवाद आदि समझाते थे। आज ई का हो गया। इ पूंजीवादी समाजवाद है का? ढोलक सोंच रहा था। जब हम चुनाव में सौ दो सौ में वोट खरीद लेते है तब यहां तो बड़का बड़का कंपनी है? कुछो हो सकता है?
फिर ढोलक ने फैसला किया कि वह नेताजी से पूछेगा कि उसे विदेशी मोदीखाना में उधार मिलेगा क्या? परव-तेउहार पर उसके घर गरम-मशाला आएगा की नहीं?
सोंचता हुआ ढोलक घर आया। बधाई हो ढोलक। बेटा होलो, तों बाप बन गेला। ढोलक असमन्जस में पड़ गया। सोंचा था इस बार बेटा होगा तो उसका नाम नेताजी के नाम पर रखेगा पर अब क्या करे!
 आखिर सोंच विचार कर ढोलक ने अपने बेटा का नाम गिरगिट रख दिया और नेताजी के  आने का इंतजार करने लगा।



05 दिसंबर 2012

भागमभाग


जीवन के जद्दोजहद में
भागते भागते
बहुत कुछ छूट गया है पीछे....

छूट गया पीछे
दलान पर
गांव-जबार से लेकर
दुनीया भर  की चिंताओं
पर चिंतन करना...

छूट गया पीछे
पनघट-पनहारिन
देवर-भौजाई
मौया-बाबू

छूट गया पीछे
दोल-पत्ता
गुल्ली-डंडा
नुक्का-छुप्पी
श्याम-चकेवा

छूट गया पीछे
भोज-भात में
पंगत-पत्तल
होय हरी
रामरस

छूट गया पीछे
किसी के निधन पर
शव निकलने तक
चुल्हा नहीं जलना
कहमां से हंसा आ गेलै
निर्गुण का सुनना
बाबू जी का परतकाली
देवर-भौजाई
साला-साली
के बीच की प्रेमपुर्ण गाली

कहां थे हम, कहां आ गए।
भागमभाग में सबकुछ लुटा गए।।



02 नवंबर 2012

हिन्दु करते है मजार की देखभाल। जिंदाशाह की मजार पर लगा उर्स का मेला।


बरबीघा, शेखपुरा (बिहार)
कौन हिन्दू, कौन मुस्लमा यह तुम जानो/हम तो आदमी हें आदमी से प्यार करते है। कुछ इसी अंदाज को जिबंत करता है बरबीघा के रामपुर सिंडाय गांव में स्थित जिंदाशाह का मजार। इस मजार की देख भाल से लेकर उर्स मेले का प्रतिवर्ष आयोजन तक का काम गांव के हिंदू समुदाय के लोग ही करते है। कार्तिक माह के चतुर्थी के दिन इस मजार पर प्रतिवर्ष उर्स मेला का आयोजन किया जाता है जिसमें बरबीघा के आसपास के लोगों से लेकर बंगाल, उत्तरप्रदेश सहित अन्य जगहों से लोग आते।
सालों से आस्था का प्रतीक जिंदा शाह के मजार पर चादरपोशी से लेकर अन्य धार्मिक काम मो0 जमील करते है जबकि देखभाल एवं मेला आयोजन का उपेन्द्र सिंह, धनन्जय कुमार, साकेत सिंह, राजीव सहित अन्य लोग करते है। मनोकामना पुर्ति स्थल के रूप में प्रसिद्ध इस मजार पर प्रति सप्ताह गुरूवार का विशेष पूजा की जाती है।
उर्स मेले के दिन जहां इस मजार पर मुस्लिम समुदाय के लोग चादर चढ़ाते है तो हिन्दू समुदाय के लोग अपने रीती रिवाज से पूजा करते है। इस मजार पर बली प्रथा का आयोजन भी होता है जहां दोनांे समुदाय के लोग मन्नते पुरी होने पर बकरे की बली देते।
इस मजार पर रात भर चलने वाले मेले को लेकर गांव कें लोगों में काफी उत्साह है और गांव के लोग मिलकर कफन नाटक का मंचन भी किया।


31 अक्तूबर 2012

50 करोड़ की गर्लफ्रेंड.--उर्फ---कहो तो मैं भी हरामखोर हो जाउं...((व्यंग्य))


अरूण साथी
थरूर साहब ने जब से कहा है कि उनकी मोहतरमा 50 करोड़ से भी बेशकीमती है तब से मेरी मोहतरमा का पारा चढ़ा हुआ है।
नकारा! निकम्मा! कहां 50 करोड़ और कहां एक पत्ता टिकुली पर आफत। यही कहते रहे आजतक कि प्यार करते हो। झूठा कहीं का। जाओ, जाकर कुछ सीखो, प्यार-व्यार और कमाई-धमाई। निरा-नकारा, मुंआ पत्रकार बन कर बैठे हो। काम के न काज के, ढाई सेर अनाज के।
मोहतरमा को इतने गुस्से में मैंने कभी नहीं देखा, उलटे जब से मंत्री जी ने अपना अनुभव बधारते हुए कहा कि पुरानी बीबी मजा नहीं देती, तब से मैडम के होश फाख्ता थे। पता नहीं कौन से सुनामी के डर से सहमे रहती, गाय की तरह और आज अचानक थरूर साहब ने जुगाली क्या करी, मौडम सिंहनी बन गई।
गुस्सा तो मुझे भी बहुत आ रहा है ई मोदी साहब पर। भला बताईए तो, क्या जरूरत थी ततैया के छत्ते में हाथ डालने की। कहते है 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड देखा है? साहब हमलोग गरीब आदमी है। हमारे सात पुस्तों ने इतनी रकम नहीं देखी तो गर्लफ्रेंड कहां से देखंेगे। पिटबा दिया न एक गरीब बेचारे को। मोहतरमा सुगंधा को छू कर देखना चाह रहा था। कैसी होती है 50 करोड़वाली। लगा झापड़। चटाक। ऐसी ही होती है। डोन्ट टच। ओनली सी।
अब देखिए ई बुद्धू बक्से बाले बनिया सब को। मंगनी का माल करोड़ों में बेच देते है। 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड। गलथेथरी चालू। नारी जाति का अपमान। कौन समझाए। भैया कौन से ऐंगल से गर्लफ्रेंड कहने से नारी जाति का अपमान हो गया। यह तो फैशन का युग है और आप गरंटी की इच्छा कर रहे है।
उलटी करते है नेता और साफ करनी पड़ रही है मुझे। मैडम के गुस्से पर प्यार का वर्फ डालने लगा। देखिए मैडम ई नेता लोग के बात पर कान नहीं देने का। किसी के कहने भर से क्या होता है जब हमे मजा आ रहा है तो? और ई 50 करोड़ बाली बात पर तो ध्यान ही मत दो। ई सब हराम की कमाई का नतीजा है। कई कई होती है। अपनी तो बस तुम्ही काफी हो। या कहो तो मैं भी हरामखोर हो जाउं....

09 अक्तूबर 2012

रिमझिम बरसात .. और कादम्बिनी



आज रिमझिम बरसात हो रही है और ऐसे में गांधी जी को समर्पित कादम्बिनी के इस अंक को पढ़ने का मजा.... निश्चित ही कादम्बिनी का यह अंक पठनीय और संग्रहणीय है।  


08 अक्तूबर 2012

जितिया, तीज और करवाचौथ, महिलाओं को गुलाम रखने के उपाय..


पोंगा-पंडित और पोथा सब बकबास है, इनको आग के हवाले करने के बाद ही स्वस्थ समाज का निर्माण किया जा सकता है। अब देखिए, आज जितिया पर महिलाओं का उपवास है और इसके लिए परंपरागत तरीके से सुबह चार बजे महिलाऐं कुछ नास्ता करके चौबीस घंटे का उपवास करती थी पर इस बर पांेगा महराज का फरमान आ गया कि रविवार को शाम 8 बजे तक ही कुछ खा सकती है। भला बताइए 36 घंटा निर्जला उपवास? 
जितिया, तीज, करमा, करवाचौथ, ऐ सारे के सारे औरतों की गुलाम मानसिकता का प्रतीक है।
मेरी समझ से यह पुरूषों के द्वारा महिलाओं को मानसीक रूप से गुलाम रखने का यह तरीका है। जितिया बेटा के लिए, तीज और करवा चौथ पति के लिए, करमा भाई के लिए, सारा उपवास पुरूषों के लिए? महिलाओं के लिए पुरूष कौन सा उपवास करते है?
हलांकि पुरूषों के द्वारा महिलाओं गुलाम की कई जंजीर भी पहनाई गई है जिसमें सिंदूर, मंगलसुत्र, चुड़ी आदि आदि....। पुरूष शादीशुदा होने पर कुछ क्यों नहीं पहनता? हद तो यह कि महिलाओं की मनसिकता इसको लेकर इतनी पवित्र है जितनी भगवान को लेकर...।

इस तरह के पर्व को लेकर पहले मां से झगड़ता था अब बीबी से झगड़ता हूं। हद हाल है। चौबीस चौबीस घंटे निर्जला उपवास। चलो यह तर्क भी ठीक है कि सेहत के लिहाज से उपवास ठीक होता है पर बिमार लोगों के लिए? चाहे प्राण क्यों न चली जाए, उपवास तो करनी ही है। एक साल से बीबी को डायबटीज है पर जब उपवास की बात आती है तो अड़ जाती है, सीधा, करेगें। हलांकि इस बार आज सुबह चार बजे लड़-झगड़ कर  नास्ता तो करा दिया पर उपवास खत्म नहीं करा सका हूं..।


05 अक्तूबर 2012

बदले बिहार का बिकल्प नहीं हो सकते लालू प्रसाद यादव।

अरूण साथी
बिहार की राजनीति करवट ले रही है। खगड़िया में सीएम पर हुए पत्थराव के बाद एकबारगी पूरे देश को लगा जैसे बिहार में नीतीश कुमार का तिलिस्म खत्म हो गया। नीतीश कुमार नायक से खलनायक बन गए! लालू प्रसाद यादव को लगा जैसे बिलाय के भाग्य से छिंका टूट गया हो और वे जातिवाद का पूराना कार्ड खेलते हुए कहा-मैंने कभी नहीं कहा भूरा बाल साफ करो? (तो जरा यह भी बता दे कि किसने कहा था)
    इस सबके बीच एक आम आदमी की तरह सोंचते समझते बेचैनी सी होने लगी है। यह सच है कि नीतीश कुमार ने जिस दलदल से बिहार को बाहर निकालने की लड़ाई लड़ी आज वह स्वयं उसी दलदल में फंस गए है। पर यह भी सच है कि आज का बिहार लालू प्रसाद यादव के द्वारा बेआबरू किए बिहार से बहुत आगे निकल, देश के नंबर एक राज्य की रेस में कजरी गाता हुआ आगे बढ़ रह है।
    नीतीश कुमार के योगदान को बिहारी मानस एक बारगी भुला नहीं सकता। बदनाम बिहारी की गाली से उपर उठ कर बिहार अपने नवनिर्माण की कहानी गढ़ रहा है। बिहार में आज न सिर्फ अच्छी सड़के है बल्कि यहां की बेटियां घरों की चाहरदिवारी से बाहर निकल नई ईवारत लिख रही है। बिहार का महिला सशक्तिकरण देश के लिए प्रेरणा बना हुआ है। कानून के राज की कल्पना जमीन पर शनै शनै उतर रही है। किसानों के घरों में खुशहाली के बीज बोया जा रहा है। अब किसान के घर में परंपरागत धान की मोड़ी (बिचड़ा) नहीं मिलता बल्कि हाइब्रीड धान का बीज बिहार सरकार उपलब्ध कराती है। श्रीविधी की खेती किसान अपना रहे है। अस्पतालों में जानवरो की जगह मरीज नजर आते है, मेला लगा रहता है। डाक्टर भी छुपछुपा कर ही निजी क्लिनीक में रहते है। स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति भी बढ़ी है, खास कर महादलित बच्चों की। आज से पहले स्कूलों में महादलितों कें बच्चे पढ़ने के लिए नहीं जाते थे पर आज मेरे ही गांव में दो दर्जन महादलितों के बच्चे पढ़ाई कर रहे है। कई चीजें है जो बिहार में बहुत अच्छा हुआ है ठीक उसी तरह बहुत कुछ बुरा भी हुआ है।
    बुराई की जो सबसे पहली बात है वह यह कि नीतीश कुमार को सच बोल सके ऐसा एक भी आदमी उनके साथ नहीं है। चटुकारिता उनकी पसंद हो गई तो चटुकार उनके चहेते। निंदक नियरे राखिए का परंपरा उन्होंने स्वयं खत्म कर दी और मीडिया तक पर निंदा को प्रतिबंधित कर दिया। परिणाम बुराईयों तक उनका ध्यान जाए तो कैस?
    गली गली सरकारी शराब की बिक्री, होटलों और ढावों में अवैध शराब की खुलेआम बिक्री और उसके गिरफ्त मंे आते युवा, निरंकुश थानेदार और प्रशासन, विकास योजनाओं मंे लूट की छूट, स्तरहीन शिक्षकों की बहाली सहित कई मुददों के बीच सुशासन का बिहार जकड़ता चला गया पर नीतीश कुमार को भनक तक नहीं लगी। एक के बाद एक अपने ही दल के ताकतवर नेताओं को शंट कर गणेश परिक्रमा करने वालों को आगे लाकर नीतीश कुमार ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। अच्छे बुरे का फर्क भुल गए और परिणाम आज बिहार उद्वेलित है। गुस्से से भरा हुआ।
    जहां तक शिक्षकों का सवाल है तो नीतीश कुमार ने वैसे हाथों को रोटी दी जिनके घरों का चुल्हा दो सांझ नहीं जलता था। नीजी विद्यालयों मंे एक-दो हजार में पढ़ाने वालो को सात से आठ हजार वेतन दिया और अधिक की चाह में उनका गुस्सा कितना जायज है?
    सेवा का अधिकार लागू हुआ पर अधिकारियों की निरंकुशता बाधक बन गई पर साठ से सत्तर प्रतिशत लोगो को समय पर उसका काम हेने लगा। सुपरवाईजर को बीडीओं बनाने की जातिवादी राजनीति उनके लिए ही खतरनाक साबित हो रही है। बीडीओ का पद जनता से सीधा जुड़ा होता है और सुपरवाइजरों को पांच पांच लेने की लत लगी थी सो यहां भी बरकरार रह गई।
    इस सब के बीच लालू प्रसाद यादव बिहार का बिकल्प बनने के लिए परिवर्तन यात्री बन गए। गांव गांव जाकर जातिवादी अलख जागाने लगे। गुस्से को हवा देकर चिंगारी से आग बनने में जुट गए। पर शायद वे भुल गए कि उनके खुद के पास पिछले पांच-सात सालों में बदले बिहार के लिए कोई विजन नहीं है। वही हुर्र हुर्र की राजनीति। वही आरएसएस का पुराना आलापा। वहीं बंदरधुरकी। वही जाति वाद का विष बेल। न विकास की बातें, न मंहगाई से त्रस्त जनता के दर्द का एहसास। न बढ़े डीजल की परवाह न रसोई गैस की मंहगाई पर चिंता। न रोजगार की बातें और न ही शिक्षा और किसानों के बेहतरी की सोंच।
    जिस बंशवाद ने बिहार को लूटा उसी की नींब फिर से नजर आने लगी। बीबी और साला से ईतर पुत्र को राजनीति लांउचिंग कर रहे है।

    सो इतनी बिषमताओं के बीच लालू प्रसाद नीतीश कुमार का विकल्प नहीं बन सकते और समय रहते नीतीश कुमार ने सुधार कर लिया तो लालटेन की बुझी लै किस्से कहानियों की बातें ही रह जाएगी।

18 सितंबर 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी के सुधी पाठकों से क्षमा याचना के साथ निवेदन..

एक छोटी सी लव स्टोरी के संबंध में कुछ मित्रों की सलाह है कि अब इसे ब्लॉग में न देकर एक किताब की शक्ल देनी चाहिए और इसी दुविधा की वजह से अगली कड़ी अटकी हुई है....प्रकाशक की खोज जारी है.....
आपके विचार के इंतजार में...
आपका
अरूण साथी

09 सितंबर 2012

राजद्रोह--असीम त्रिवेदी को समर्पित..


विनायक सेन को देशद्रोह की सजा होने के बाद रचित मेरी यह रचना आज असीम त्रिवेदी  को समर्पित..
हौसला होता है, जब तक विनायक, असीम सरीखे लोग है मेरे देश का कोई बालबांका नहीं कर सकता...

 

राजद्रोह है 
हक की बात करना।

राजद्रोह है
गरीबों की आवाज बनाना।
खामोश रहो अब
चुपचाप
जब कोई मर जाय भूख से 
या पुलिस की गोली से
खामोश रहो।


अब दूर किसी झोपड़ी में
किसी के रोने की आवाज मत सुनना,
चुप रहो अब।


बर्दास्त नहीं होता
तो
मार दो जमीर को
कानों में डाल लो पिघला कर शीशा।


मत बोलो 
राजा ने कैसे करोड़ों मुंह का निवाला कैसे छीना,
क्या किया कलमाड़ी ने।


मत बोला, 
कैसे भूख से मरता है आदमी
और कैसे
गोदामों में सड़ती है अनाज।


मत बोलो,
अफजल और कसाब के बारे में।
और यह भी की 
किसने मारा आजाद को।


वरना
असीम त्रिवेदी
विनायक सेन
और 
सान्याल की तरह
तुम भी साबित हो जाओगे 
राजद्रोही....

राजद्रोही।

पर एक बात है!
अब हम
आन शान सू 
और लूयी जियाबाओ 
को लेकर दूसरों की तरफ
उंगली नहीं उठा सकेगें।

28 अगस्त 2012

मैनेज कर लो भाई, अखबार या चैनल देता ही कितना....!

अरूण साथी
शुक्रवार, स्थान शेखुपरा जिले का बरबीघा नगर। पिछले 18 तारिख से बरबीघा थाना के ठीक सामने गेसिंग, जुआ का अड्डा खोल देने की सूचना मिली और 20 को जा कर जांच किया तो मामला सही पाया। फिर इसके बारे में जानकारी इक्कठी की तो पता चला कि उच्चाधिकारियों से 50000 प्रतिमाह में सेटिंग हुआ है। एसपी एक आइपीएस हैं पर उनके नाम पर उनका एक बोडीगार्ड रूपये का लेनदेन करता है जिससे जिले में भ्रष्टाचार की खुली छूट है।
  खैर, एक दिन बाद पता चला कि मीडिया को भी मैनेज किया गया है, कितना में यह कह नहीं सकता क्योंकि मेरे पास मैनेज करने कोई नहीं आ सकता, कारण सर्वविदित है कि यहां जाओगे तो उलटा पड़ सकता है। कई बार इस चक्कर में पुर्व में हंगामा हुआ है।
    खैर, 24 तारीख को सुबह प्लान बना कर गेसिंग के अड्डे पर धावा बोल दिया। साथ में कोई कैमरा मैन तो रख नहीं सकता क्योंकि कम्पनी अफोर्ड नहीं कर सकती तो हेल्प के लिए सहयोगी मुकेष कुमार को साथ ले चला। मन में डर भी लग रहा था कि जो लोग थाना के सामने गेसिंग खोल सकता है वह दबंग भी होगा पर चला गया। कैमरा खोलते ही संचालक और जुआ खेलने वाले भागने लगे। न्यूज धंटो बनाया। सारी बात उठाई। ऑफिस आ गया। दरोगा का बाइट लिया। एसपी को मोबाइल कर उसका वर्जन लिया, क्योंकि वह बाइट नहीं देती। पत्रकार के डर से ऐसे भागती है जैसे बिल्ली को देख कर चूहा।
    न्यूज भेजना शुरू किया। तभी मेरे एक बुजुर्ग सहकर्मी आ धमके। उनके मोबाइल पर फोन आया जो दूसरे अखबार के रिपोर्टर थे। दोनों में बाहर जाकर वार्ता हुई। फिर उन्होने चर्चा चलाई इस बार बख्स दिजिए, मैनेज कर लिजिए, न्यूज भेज कर क्या मिलने वाला, अखबार या चैनल देता ही कितना है।
    खैर, मैनेज तो नहीं किया पर इतने दिनों के बाद अब थकने सा लगा हूं ... ....भविष्य की सोंच कर..... ईमान भी डोलता है....देखें कब तक बचा पाता हूं..

20 जुलाई 2012

कसौटी पर असफल... अंडरग्राउण्ड राहुल गांधी......


अरूण साथी
बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूं, राहुल गांधी का यह बयान बड़ा ही हास्यास्पद है। इससे पहले दर्जनों छोटी भूमिकाओं को निभाने में असफल रहे राहुल गांधी जब इस तरह का बयान देते है तो माथा ठोकने का मन करता है।
राहुल का यह कहना कि यह निर्णय पार्टी नेतृत्व और मनमोहन सिंह पर निर्भर है और भी बचकाना है। सबको पता है कि अभी तक पूरी तरह से असफल युपीए सरकार और अन्डरएचीवर पीएम के नेपथ्य में निर्देशक मां-बेटे ही रहे है।
पहली बार राहुल गांधी को देखने भर का मौका पिछले विधान सभा चुनाव में मिला जब अपने उम्मीदवार अशोक चौधरी के लिए चुनाव प्रचार लिए आए थे। भीषण गर्मी, हजारों की भीड़। भारी भरकम सुरक्षा व्यवस्था। कवरेज के लिए कई चैनलों का ओवी वैन। पैड न्यूज का जलबा। तभी अचानक आजतक का ओवी वैन बैरीकेटिंग के बगल में आकर खड़ी हो गई। रिर्पोटर मंच के नजदीक जाने का रास्ता तलाशने लगे। तभी तीन चार सुरक्षा अधिकारी उनकी ओर लपके, राहुल के आने में  अभी देर थी। अधिकारी रिर्पोटर पर बरस रहे थे-गिरफ्तार कर आतंकबादी धोषित कर देगें, क्या समझतो हो। बैन को पीछे ले जाओ। सभी हतप्रभ। मुझे लगा कि राहुल गांधी न होकर कोई आठवां अजूबा आने वाला हो।
फिर राहुल ने भाषण पढ़ा। भावशुन्य, उनके उम्मीदवार का  पराजय।
बिहार में लोकसभा हो या विधान सभा चुनाव जहां जहां राहुल गए, उम्मीदवार को मुंह की खानी पड़ी। 
एक असफल भूमिका।
फिर 2012 के युपी चुनाव में अपने लोकसभा सीट में अथक परिश्रम के बाद भी उम्मीदवार नही ंजिता सके।
एक असफल भूमिका।
जिस दलित कलावती के घर खाना खाने का नाटक-नौटंकी किए उसके घर को दबंगों ने ढाह-जला दिया, एक व्यक्तिगत परिवार के साथ न्याय-विकास संभव नहीं हो सका।
एक असफल भूमिका।
2009 में मंत्रीमंडल गठन में इनके ईशारे पर कई चहेतों को मंत्री पद मिला और राहुल की भूमिका को देश को नई दिशा देने बाला बताया गया, वही सरकार आज घोटालों का प्रर्याय बन कर रह गई।
एक असफल भूमिका।

जनलोकपाल बिल, अन्ना टीम, बाबा रामदेव और रामलीला मैदान। नेपथ्य में राहुल गांधी मुख्य भूमिका में थे, संसद में जनलोक पाल का खुला विरोध और अपरिपक्व भाषण, अन्ना की गिरफ्तारी, अनशनकारियों पर रात में हमला...
राहुल गांधी अंडरग्राउण्ड...
देश के सामने आतंकबाद, किसानों की आत्महत्या, छद्म धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक कट्टरवाद, आतंकियों को सम्मान जैसे मुद्दो पर.. 
राहुल गांधी अंडरग्राउण्ड....

यह राजनीति का वंशबाद नही ंतो और क्या है कि अनेकों बार कसौटी पर असफल रहे, ज्वलंत मुद्दों की समझ नहीं रखने वाले राहुल गांधी को बार बार नई भूमिका देने की बात होती..या फिर रसातल में जा रहे देश के लिए अंतिम कील की व्यवस्था हो रही है।

08 जुलाई 2012

सत्यमेव जयते का दलित उत्पीड़न! सिक्के का दूसरा पहलू भी है..


सत्यमेव जयते में आज दलितो के उत्पीड़न की कहानी दिखाई गई, इसे सिरे से नकारा नहीं जा सकता, पर इनती बुराईओं के बाद भी इसी समाज में अच्छाई भी है जिसको सामने आना चाहिए।

बात बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह से शुरू करना चाहूंगा। श्रीबाबू (पुकारू नाम) ने 1961 में बिहार के देवघर मंदिर में दलितों के साथ मुख्यमंत्री होते हुए प्रवेश किया। भेदभाव और छूआछूत निश्चित ही निंदनीय है पर इसको तोड़ने के लिए भी बहुत लोगो ंने सराहनीय योगदान दिया है। बाबा साहेब अंबेदकर से लेकर अपने गांव तक यह नजारा मुझे दिख जाता है। बाबा साहेब के कार्टून को लेकर भले ही बबेला मचा हो पर उनको अंबेदकर बनाने मंे एक पंडित शिक्षक का ही हाथ रहा है।

मैं अपनी बात भी कहना चाहूंगा। लगन मांझी की पत्नी जिन्हें मै चाची कहता हूं आज भी जब तब कहते रहती है ‘‘अपन छतिया के दूध पिलैलियो हैं बेटा।’’ दरअसल किसी कारणवश टोना टोटका को लेकर मां ने जन्म के समय में ही मुझे इनके यहां बैना (उधार) दे दिया था और उनका ही दूध पी कर मैं इस दुनिया जीना सीखा। आज तक कर्ज है मेरे उपर। 

फिर जब से होश संभाला तब से कभी छूआछूत को नहीं माना। बहुत सारी बातें है पर सहज है। इंटर के समय में बरबीघा में कुछ लोगांे से दोस्ती हुई जिसमें से नीरज, श्रीकांत, कारू, दीपक इत्यादि का नाम है। बाद के दिनों मे दोस्तों की जाति का पता चला। उसी में जाना कि श्रीकांत और दीपक चमार जाति का है, श्रीकांत बगल के गांव जगदीशपुर का रहने वाला। सबकुछ सहज। फिर सबके साथ कई बार धूमने टहलने गया। ककोलत झरना में स्नान के बाद सबने मिल कर खाना बनाया और एक ही थाली में श्रीकांत और मैं खाया। फिर श्रीकांत कें पिताजी का निधन हुआ। सब दोस्तों के साथ मुझे भी न्योता दिया। दोस्तों के साथ मैं श्रीकांत कें घर चला गया। श्राद्ध का भोज खाने। बरसात का दिन और धुप्प अंधेरिया में उसके गांव पहूंचा तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं भोज खाउंगा। किसी ने संकोचवश मुझे खाने के लिए नहीं कहा, पर मैं सहजतापुर्वक सबके साथ पंगत में बैठ गया और भोज खाया।

आज तक भी कहीं  भी मन में यह बात नहीं उठती है। सिक्के के दो पहलू होते है, पर इसमें यह भी सच है कि एक पहलू में अंधेरा धना है और दूसरे पहलू में रौशनी कम। बात जब अंधकार की हो तो साथ साथ रौशनी की चर्चा भी हो जाए तो इसे ईमानदारी कहते है, वरना सदियो से यह मुददा राजनीति भेंट चढ़ती रही है और चढ़ती रहेगी।

24 जून 2012

संपादक हरीश पाठक के जाने की खुशी


राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संपादक हरीश पाठक से बास्ता बस एक जिला कार्यालय प्रभारी और संपादक का था। स्वभावगत चापलूसी नहीं करने और काम से काम रखने की आदत आज के दौर में भारी पड़ती है और मेरे साथ भी ऐसा ही था। दर्जनों बैठकों में उनके साथ बैठना हुआ और पत्रकारिता के अधोपतन देखने को मिला। साल डेढ़ साल पहले बिहारशरीफ में हुए बैठक में सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन की चर्चा होना और संपादक का खामोश, तमाशाबीन बना रखना मुझे खटका और मैंने उसे अर्न्तजाल पर व्यक्त क्या किया महोदय को बुरा लगा था और फिर अगले बैठक में ही हरीश पाठक ने तल्ख और व्यंगात्मक लहजे में कहा कि हां आपके सुविचार मुझे न्यूज पोर्टलों पर पढ़ने को मिल जाते है पर मैंने कोई नोटिस नहीं लिया। सबसे निचले स्तर पर पत्रकारिता करते हुए किसी से डरने की बात नहीं होती और यह साहस विज्ञापन की वजह से होता है और फिर कोई नौकरी तो होती नहीं कि निकाल दोगे। मामूली सा मानदेय की परवाह क्या? विज्ञापन के वजह से यह कि जब विज्ञापन आप अच्छा खासा देते है तो आप एक कमाउ पूत होते है और मैं विज्ञापन का टारगेट हमेशा पूरा करने वालों में से था। सो परवाह नहीं किया और मुझपर गाज भी नहीं गिरी। अभी एक मार्च को हुए बैठक में जब युनिट हेड मृदुल बाली नहीं आए तो सिर्फ संपादक का ही आना हुआ और बैठक में एक बार फिर मुझसे उनकी तल्खी सामने आई और मिटिंग में ही लगभग सबपर बरस पड़े। मुझपर विशेष, अरूण साथी जी के विचार नेट पर बड़ा ही उत्तेजक होते है पर कभी किसी समाचार को लेकर मुझसे संपर्क नहीं किया जाता। कोई संपर्क नहीं करता। मोबाइल पर भी नहीं। सही भी था। आज तक कभी संपादक से समाचार को लेकर संपर्क नहीं किया। कभी उनसे मिलता भी नहीं। यह विज्ञापन की वजह से संपादक के घटे कद की महिमा थी और हताश संपादक की व्यथा। यह भी की विज्ञापन ने एक संपादक का कद इतना छोटा कर दिया कि संवाददाता का उनसे कम सरोकार रहता है और विज्ञापन प्रबंध से  अधिक।

फिर मुझे लगा कि एक ही संस्था मंे काम करते हुए इस तरह की तल्खी ठीक नहीं सो उनसे जाकर केबीन में मिला। उन्हांेने मुझे बैठने के लिए नहीं कहा! तब भी मुझे लगा कि बात करनी चाहिए। जब बात प्रारंभ की तो वे लगभग बरस पड़े। आप नेट पर क्या क्या लिखते है, बहुत बड़े विद्वान समझे है? मैं भी कोई बेकार आदमी नहीं हूं। मेरे भी कई किताब छप चुके है। विद्वता का दर्प। मैं तुरंत बाहर आ गया। फिर कभी उनसे बात नहीं की। फिर मुझसे अखबार का कार्यालय छीन लिया गया। शेखपुरा रिर्पोटर नवीन सिंह को दिया गया और मैंने अखबार को अलबिदा कह दी। बात खतम।
मैंने कोई लॉबिंग नहीं की। किसी से नहीं मिला। कोई फरियाद नहीं की। सोंचा, पत्रकारिता निष्ठा और ईमानदारी से करनी है तो चापलूसी कैसा? पर मन में यह बात खटकटी रहती कि सच अगर ब्लॉग पर नहीं लिखता तो आज कार्यालय प्रभारी बना रहता पर क्या करें कुछ आदतें है कि बदलती नहीं और जब मीडिया मंच पर उनके जाने की खबर देखी तो लगा कि इस गरीब की हाय लग गई।
कल ही तो कहीं पढ़ा है-
कहो तो खरीद लूं दुनियां, कहां की मंहगी है।
बस जमीर का सौदा बुरा सा लगता है।।

22 जून 2012

पेसुआ हनुमान (चुटकी)


अरूण ‘‘साथी’’

बाबा बाचाल है! जंगलराज के समय बाबा का बड़ा प्रताप था। इन्हें राजा का खासम-खास माना जाता था और प्रतापी बाबा खूब नेम-फेम कमाए। जैसे ही जंगल राज गया बाबा की बोलती बंद। ई बात बाबा बर्दास्त नहीं कर सके सो बाबा चित्त-पटांग हो गए। बाचाल बाबा भानूमति के कुनबे के नए सु...शासनी राजा के राज दरबारी बन गए। बाचाली बाबा, फटाफट बोलने लगे। हंगामा होने लगा। फिर जब बाबा ने कहा कि गठबंधन रहे कि खत्म हो, हम सेकूलर के साथ रहेगें तब किसी स्वनाम धन्य राजसी दरबारी को आकाशवाणी हुई की बाबा पोसुआ हनुमान है। जय हो। 
पोसुआ हनुमान, काफी शोध-विचार करने के बाद कल्कुलेटर से जो नतीजा निकला वह तेंतिस हजार के करंट का झटका था। हनुमान मने उ हनुमान नहीं जो राजा राम के भगत थे, हनुमान मने बंदर, उछल-कूद करे वाला। और पोसुआ मने पालतू। बड़का बात यह कि पोसुआ हनुमान को पोसना हजार हाथी रखने जैसा है। बड़ा खर्चा है। पुराने राज से जब इनका खर्च उठाया नहीं गया तो नये दरबार में है।
वैसे यह तो हमारा मतिभ्रम ही है कि कभी जंगलराज तो कभी सु....शासन के फेरा में फंस जाते है। सब माया है, बाकि सब ऐके है। मतिभ्रम नहीं होता तो जंगलराज के कई जनावर सु...शासन में दरबारी है, नाम में क्या रखा है, काहे कह दे, डर तो लगता ही है।
क्या कहा डर के आगे जीत है, लिजिए तो एक नाम और काला (श्याम) अक्षर भैंस बराबर....बाकि आप बताईए। आदत ही है आप सबकी, दूसरके के कंधा पर बंदूक रख के छोड़े के।
चर्चा तो पुराना दरबार में भी हो रही है, भले ही दरबारी नहीं थे पर भौजी तो थी, गर्मा कर बोली-साहेब आप फेरा में फंस गए, ई सब तरे मलाई खा रहा है।
साहेब कहां चुप रहते, बोल-जमाना औसने है जी, गुड़ खाए और गुलगुला से परहेज....। ससुरा हम तो गुड़ और गुलगुला दोनों से परहेज के फेरा में कलट गए।
जो हो सो की- भिसलरी वाटर और गुलाब मिलाकर नहाने वाले नेता जी टपक पड़े। चुपेचाप तमाशा देखिए, सब मिलकर इनका क्रिया करम करे में लग गया है।
धत्त तेरी के बुरबक, चोप रहिए, यहां तो करेजा पर भौंसा लोट रहा है। मैडम से जोंक नियर चिपके के फेरा में ई लगा हुआ है। ई हमरे सेकुलर वाला फंडा से चिमोकन नियर चिपके बाला है, जहां मैडम चिपका की सब गुड़ गोबर हो जाएगा।
तभी भौजी टुभुक पड़ी-साहेब, ई सेकुलर कौनो सौतनिया के नाम है, नींदों में आप बड़बड़ाते रहते है।
ई ला, अब इनकरा कैसे समझाबें, सुना- जो बहुसंख्यकों को गरिताया है और अल्पसंख्यकों को पुचकारता है, उसे सेकुलर कहते हैं।
अच्छा साहेब, तभिए सेकुलर सरकार में कसाब और अफजल गुरू ऐश कर रहल हें,, 
जय सेकुलर भगवान की,, जय हो...

24 मई 2012

कांग्रेसियों के नाम मैडम की एक अपील। उर्फ यह साढ़े सात रूपया कितना होता है।

अरूण साथी
हमारी लोकप्रिय सरकार ने पेट्रोल की कीमत क्या बढ़ाई, लोग चिल्ल पों करने लगे । हद है भाई, आखिर सरकार मैडम जी चलाएगीं की चिल्ल पों करने वाले लोग संधी। अजी जब वोट देते वक्त जनता को तकलीफ नहीं होती और हमारा समर्थन करती है तो यह इस बात को साबीत करने के लिए काफी नहीं की जनता का हाथ कांग्रेस का साथ है। और फिर हो न हो चिल्लाने वाले मीडिया के पीछे आरएसएस का हाथ ही है। मैडम के दरबार में बैठकी सजी हुई है और एक गांधी टोपी पहले नेता जी ने मख्खन लगाई तो दरबार में कई लोगों ने बोलने की हिम्मत जुटा ली। हलंाकि दादा के चेहरे पर थोड़ी तल्खी थी पर वे उसे छुपाने में सफल होते हुए बोले-दीदी को क्या हो जाता है मैडम, जब-तब विपक्षी के साथ जाकर खड़ी हो जाती है। हमने तो अपने अनुभव के आधार पर ही सोंच समझ कर तेल की कीमत बढ़ाई है। मैडम आपका यह फैसला बिल्कुल जनहितकारी है। आखिर आप दूरदर्शन है। दूर तक देखकर कोई भी फैसला करतीं है। पहली बात तो यह कि संसद का सत्र खत्म हुआ और पेट्रोल की कीमत एकाएक साढ़े सात रूपये बढ़ा दी। ज्यादा चिल्लाओंगे तो एक रूपया घटा देगें। बस।

          यह तो आपकी उदारता है कि अब भी डेढ़ रूपया घाटा लग रहा है पर आपने उसे सहने की हिम्मत दिखाई। मैडम जी मैं तो कहता हूं कि अपने कार्यकर्त्ताओं के नाम एक अपील जारी कर यह बात बताई जानी चाहिए कि तेल के दाम बढ़ने से जनता का कितना भला होने वाला है। सबसे पहला दुरदर्शन फैसला तो यही है कि पूरे विश्व में जहां प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है वहीं अपने देश में भी ग्लोबलवार्मिंग का मामला जोरों पर है फिर भी लोग दनादन गाड़ी पर गाड़ी खरीद रहे है। आखिर हमारी सरकार ने लोगो ंको सम्पन्न बना दिया है सो लोग बाज कहां आने वाले, इसलिए तेल के दाम बढ़ने से लोग गाड़ी खरीदना कम करेगें और इससे प्रदूषण और ग्लोबल बार्मिंग की समस्या कम होगी। 

तभी दरबार के रत्न सिप्पल जी महाराज से रहा नहीं गया और उवाच दिये- मैडम, पेट्रोल की कीमत बढ़ने से सबसे बड़ा फाइदा तो आम आदमी का ही हुआ है। महानगर से लेकर गांव की सड़कों पर गाड़ियां सरपट दौड़ती रहती है और इससे एक नहीं कई परेशानी होती है। पहली परेशानी तो यह कि महानगर में रोड जाम, आम हो गया है। अब मंहगे तेल से जाम से निजात तो मिलेगी ही, दूसरा फायदा यह कि अब लोग या तो पैदल चलेगें या साइकिल से। दोनों ही हाल में उनका सेहत सुधरेगा। देश में डायबटीज की शिकायत तेजी से बढ़ रही है और जब लोग साईकिल की सवारी करेगें तो इस बिमारी में सुधार आएगा ही।

और अन्त में दरबार में कहीं से कुत्ते के भौंकने की आवाज आई और सब उसकी तरह मुखातिब हो गए। आश्चर्य कि मैडम से लेकर सभी दरबारी तक उसकी भाषा को समझ रहे थे। सो उस डॉगी ने भौंक दिया। मैडम जी यह सब आरएसएस का प्रोपगंडा है। जनता तो इससे खुश है, खुश नहीं होती तो आज सड़कों पर गाड़ियां नजर आती? और मीडिया वाले भोंपी तो आरएसएस से मिले हुए है सो आज यहां से ही अपने कार्यकर्त्ताओं के नाम उक्त आशय की अपील जारी कर दी जाए और यह फरमान कि कलेजा तान के कांग्रेसी पेट्रोल के ंदाम के बढ़ने के जनहितकारी फायदे को लोगों को बताए और देश को विकास की राह पर पैदल लेकर जाए...।

मैडम जी खामोश रही, तभी वहां युवराज ही आ गए।  सभी ने एक सुर से युवराज को अभी अन्डरग्राउण्ड ही रहने की सलाह दी। मैडम ने भी कहा-यह सब बेकार की समस्या है और इस सबसे टूमको कुछ लेना डेना नहीं, साइलेंट रहो, और रूम से बाहर मट निकलो कोई मीडिया बाला पकड़ लेगा।
पर मम्मी ओबामा अंकल का कॉल आया था, पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए थैंक्स कह रहे थे, अंकल बोले-मम्मी को कहना कि मैंने भारत मंे तेल की अधिक खपत पर चिंता जताई थी और आपने समझदारी से काम ले लिया।

जाते जाते युवराज ने पूछ लिया-मम्मी यह साढ़े सात रूपया कितना होता है। 



09 मई 2012

बिहार मे बिकाउ मीडिया का दूसरा पहलू।


अरूण साथी
बिहार में बिपक्ष सत्ता पक्ष को कम और मीडिया को ज्यादा घेरने-गरियाने में लगी हुई है। वह चाहे लालू प्रसाद यादव हो, रामविलास पासवान या आधा भीतर आधा बाहर बाले अवसरबादी संगठन बिहार नवनिर्माण मंच के नेता उपेन्द्र कुशवाहा, अरूण सिंह। मीडिया को गलियाने के इस आग में घी का काम किया प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस माकाण्डेय काटजू का बयान और फिर सोशल मीडिया साईट्स तो है ही कीचड़ उछाने के लिए। कई बार मैंने भी इस संबंध में लिखा है पर आज मैं सीक्के के दूसरे पहलू पर चर्चा करना चाहूंगा जिसे मैंने नजदीक से जाना, देखा है।
सबसे पहले में विपक्ष की नेताआंे की बात करू तो सत्ताच्युत होने के बाद बिहार से बिपक्ष ऐसे गायब हो गया जैसे कि गदहे के सर से सिंघ। राग दरबारी के शौकीन नेता साइरस पंछी की तरह प्रतिकूल मौसम देख दिल्ली प्रवास पर पलायन कर गए और यदा कदा बरसाती मेढ़क की तरह चुनावी मौसम में टर्र टर्र करने लगे जिसे जनता ने पसंद नहीं किया। बिडम्बना यह कि रामविलास पासवान के चार दिवसीय दौरे पर आने की खबर अखबरों मंे छपती है। परिणामतः सत्ता निरंकुश होती चली गई। राजधानी से लेकर प्रखण्ड स्तर तक विपक्ष के कार्यकर्त्ता अनाथ आश्रम की तलाश में सत्ता का दामन थाम लिया। चोर से लेकर हत्यारे और बलात्कारी तक को थाने से एक फोन पर छुड़ा लेने वाले चलन को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने पोल्टीशीयन-पुलिस कनेक्शन को खत्म कर दिया। इसका दुष्परिणाम यह की निरंकुश सत्ता को टोकने वाला कोई नहीं बचा। राष्टकवि रामधारी सिंह दिनकर की उक्ति, हो कहीं भी अन्याय उसे रोक दो, पाप करे यदि शशि-सुर्य उसे टोक दो कि परिपाटी समाप्त हो गई। सत्ता तानाशाह हो गई, बिहार पुलिस ब्रिटिश पुलिस की तरह काम करने लगी। जनता का दर्द सुनने वाला कोई नहीं बचाा और परिणामतः आम आदमी सड़क पर उतरा और पुलिस की बहिशयाना चेहरा किशनगंज, नवादा, नालन्दा, शेखपुरा और अभी हाल में औरंगाबाद में सामने आया। जैसे जैसे आम आदमी का गुस्सा सड़कों पर फूटने लगा वैसे वैसे दमन चक्र चलने लगा और सरकार ने आंदोलन के लिए गठित घारा 353 को जमानती धारा से बदल कर गैरजमानती कर दिया पर यह सिलसिला नहीं रूका। इस सब के बीच जनता के साथ उसकी आवाज उठाने के लिए कौन खड़ा था? आम आदमी की आवाज को मीडिया ने मुखर किया। सरकार को शर्मशार करते हुए उसे घेरा, कई बार नीतिश जी चिढ़ गए पर मीडिया अपना काम करती रही।
हां विज्ञापन के गौरवाजिब दबाब में प्रिंट मीडिया की धार कुंद हो गई कई बार सरकार की पहल पर कुछ पत्रकारों के साथ अन्याय किया गया पर यहां भी विपक्ष कहीं नजर नहीं आया, मतलब साफ कि बिहार में जिसे हम बिकाउ मीडिया कहते है उसी ने विपक्ष की भुमिका निभाई।
और इस सब के बीच जब पानी सर से उपर चला गया तो विपक्ष ने गीली मिटटी खोद कर फरहाद बनने के तर्ज पर प्रेस विज्ञप्ति जारी करना शुरू किया या कहीं कहीं औपचारिक धरना देना प्रारंभ किया और उनकी यह खबरें या तो मीडिया में जगह नहीं पा सकी या उनके अनुसार बाजिव जगह नहीं मिली। तब पर भी कुछ कुछ मीडिया हाउसों ने प्रमुखता से खबरें लगाई पर इस सब में समुची मीडिया और ईमानदार संपादकांे और पत्रकारों को कठघरे मंे खड़ा कर दिया गया। उसे शर्मशार किया जाने लगा और देखते ही देखते बिहार में सुशासन का श्रेय मीडिया के मथ्थे आ गया गया। बिहार मंे कुशासन और सुशासन की चर्चा फिर कभी, अभी तो बस मीडिया ही।
बिहार नवनिर्माण मंच के नेता अरूण सिंह अभी हाल में ही मेरे यहां आए हुए थे और संवाददाता सम्मेलन के कवरेज के लिए जब गया तो उन्होंने और उनके साथियों ने सीधा कहा, आप लोग तो बिक गए है, न्यूज कहां छपती है? मेरा तो तरबा का घूर कपार पर चढ़ गया। छोटे से कस्बाई ईलाके में रहकर भी मैं हमेशा उनके द्वारा एयरकंडीशन हॉल, स्वीट डिश के साथ प्रायोजित संवाददाता सम्मेलन की खबरे देख-पढ़ रहा था और यदा कदा औपचारिक कुछ घंटों की घरना की खबर भी मिल जाती थी, यह सब मैंने कैसे जाना? मेरे पूछने पर तर्क वितर्क और उनकी थोथी दलील के बाद मैंने सीधा उनकों इस बात का एहसास कराया कि आधा भीतर आधा बाहर की राजनीति को मीडिया समझती है और आप इसे अपनी मर्जी से इस्तेमान नहीं कर सकते? कौन है ये नवनिर्माण मंच वाले, जदयू के राज्यसभा संासद उपेन्द्र कुशवाह, विधान सभा में गलबहियां डालने वाले अरूण सिंह इत्यादि। सिंद्धांतहीन राजनीति के इन पुरोधाओं को मीडिया ने ही इतना बड़ा किया और जब जब मीडिया ने इन लोगों को अतिरिक्त कवरेज दिया तब तब ये लोग नीतीश कुमार के हाथों मंहगें दामों मे बिके और जब उनके ब्लैकमेंलिंग फंडा को नीतीश कुमार ने नकार दिया तो लगे है चिल्लाने!
यह सच है कि बिहार की मेन स्टींम मीडिया, खास कर पिं्रट मीडिया सरकार की खबरो को प्रमुखता से जगह देती है और इसके पीछे विज्ञापन का खेल है पर यह भी सच है कि बिहार में बिपक्ष की भुमिका में बस और बस मीडिया ही है जिसके भय से हिटलरी प्रशासन सहम जाती है। छोटी खबरों पर पत्रकारों के फैज लड़ती भीड़ती है और खबरों पर पहल होती है। एक ब्रेकिंग न्यूज का असर सेंकेन्ड मंे होता है और सम्बन्धित थानों में पटना पुलिस मुख्यालय से फोन की घंटी बज जाती है। एक्शन लिया जाता है कार्यवाई भी होती है।
यह बात भी सच है कि अब न तो रामनाथ गोयनका जैसी शहीदी शख्शियत हैं और न हीं प्रभास जोशी जैसे पत्रकार, तब भी आज बहुत से लोग अपनी ही ईमानदारी से रोज रोज संधर्ष करते हुए अपने को साबीत करने में लगे है और उन जैसे लोगों के लिए जब यह शब्द सामने आता है कि बिहार में मीडिया बिकाउ है तो उनका कलेजा चाक हो जाता है इसलिए बिहार का विपक्ष आंदोलन के लिए सड़क पर उतरे और महज मीडिया के भरोसे नहीं बल्कि जनता के भरोसे और फिर देखे कि कैसे मीडिया उसे कवर नहीं करती, आग लगेगी तो धुंआ तो उठेगा ही, बिना आग लगाए ही धुंआ उठाने के लिए मीडिया पर क्यों जोर जबरदस्ती की जा रही है और सिर्फ और सिर्फ चौथेखम्भे के माथे कलंक लगाया जा रहा है।

28 मार्च 2012

चोर के दाढ़ी में तिनका उर्फ चोर चोर मौसेरे भाई उर्फ चोर बोले जोर से....


अरूण साथी-(व्यंग्य)
बचपन से ही मास्टर जी समझाते रहें चोर की दाढ़ी में तिनका तथा चोर चोर मौसेरे भाई का अर्थ पर इ खोपड़िया में आज तक नहीं घुसा और आज अचानक जब दिल्ली के संसद भवन का लाइव शो देखा तो बात समझ में आ गई। 
     गांव में एक किस्सा है कि काजी साहब के अदालत में मुकदमा आया चोर को पकड़ने का और कई लोग थे, काजी साहब ने तुक्का मारा जिसके दाढ़ी में तिनका होगा वही चोर, असली चोर ने तुरंत अपनी दाढ़ी साफ करनी चाही और धरा गया..। यहां किसको धरियेगा सब अपनी अपनी दाढ़ी साफ करने में लग गए..। जय हो जय हो।
    एक किस्सा और, एक बार गांव के बड़का जमींदार के बेटा मेरे मुर्गीखाने से मुर्गी चुरा कर भाग रहा था। मैंने देख लिया, आवाज लगाई, पर वह रूका नहीं। मैं भी कहां रूकने वाला था। रूकता भी काहे। बड़े लाड़ प्यार से पाला था उसे, भविष्य के सपने भी संजोए थे। बड़का बड़का सपना, मुर्गी के सहारे। एक मुर्गी कई अंडे, अंडों से चूजा, चूजों से फिर मुर्गी और फिर उसे बेच कर बेटे का नाम स्कूल में लिखवानी थी। बेटा पढ़ लिखकर कर चपरासी बनता और घर मे दो सांझ चुल्हा जलता, पेट में दो जून रोटी जाती और अपना जिनगी भी चैन से कटता। पर उसी को चुरा लिया, जमींदार साहब के बेटा मंुगेरना। अब गांव में मुंगेरना का धाक भी बड़का भारी था। जमींदारी भले ही चली गई पर ये लोग आज भी जमींदार ही थे। कौन हिम्मत करता इनके खिलाफ बोलने की। हिम्मत तो रामू काका ने किया था जब उसकी बेटी को... पर हुआ क्या? बेचारे जेल में सड़ रहे है। कहते है जमींदार साहब कि अब लोकशाही में जमींदारों को लठैत रखने की जरूरत का है, इ थाना पुलिस काहे है। पैसा फेंको तमाशा देखो।।।
पर मैं क्या करता, सपनो की चोरी हुई और वह भी आंखों के सामने, सो दौड़ पड़ा पीछे पीछे। मेरी भी बुद्धि कुछ भ्रष्ट मानते है गांव बाले। कहते है कि पगला गया है बगलुआ। बुरबक, लोकतंत्र, संविधान, मानवाधिकार जनलोकपाल और भ्रष्टाचार की बात करता है। कभी कभी कुछ समझाते भी थे, किताब में लिखल बात, घोड़ा के पाद....। पर कहां समझ आता था। सो दौड़ते हुए पहुंच गए बाबू साहेब के दरबाजा पर। बड़का बाबू साहब सामने मिले। ‘‘क्या बात है?’’ मैंने कहा- ‘‘आपके बेटे ने मेरी मुर्गी चुरा ली उसी के सहारे मैं सपना देखा था परिवार के पेट में दो जून रोटी की....।’’ ‘‘अरे, जमींदार का बेटा मुर्गी चुराएगा? पगला गया है का? बेटे को बुलाया, अरे मंुगेरना...। पूछा, तूने मुर्गी चुराई, उसने कहा-‘‘नहीं बाबू जी! मैं ऐसा क्यूं करूगा!’’ बगल में नौकर पगला खड़ा था-बोल दिया, ‘‘क्या बाबू जी आपके हाथ में खून तो लगा है और आप इंकार कर रहे है, देखिए इसे ही कहते है चोर के दाढ़ी में तिनका।’’ पर वह तो पागल था उसकी बात का क्या? और फिर क्या था, सभी लोग हो हल्ला करने लगे, साला जमींदार का बेटा मुर्गी चुराएगा। हो हो हो हो हो....। चोर चोर मौसेरे भाई। और चोर बोले जोर से। कई मुहावरों का अर्थ उस दिन मैं समझ गया था। 
बड़का साहब अपने लोगों से बोल रहे थे-‘‘यह हिम्मत कि दो जून की रोटी के सपने देखे, साला, फिर हमलोगों के घर मजूरी कौन करेगा? इसलिए तो बेटा ने बुद्धि का काम किया, न रहेगी मुर्गी न रहेगा सपना।’’ 
और आज।
संसद भवन का नजारा देख इन मुहावरों का अर्थ फिर से समझ गया। बेचारे सिसौदिया ने तो महज एक मुहावरा सुनाया था और वे भड़क गए। जैसे चोर को चोर कहो तो भड़कते है। भड़के भी ऐसे कि सभी के दाढ़ी का तिनका तिनका नजर आ गया और मौसेरे भाई की तरह जोर जोर से बोलने लगे। लोहीया और जेपी के समाजवाद की रंथी को कांधें पर उठाए बेचारे कठोर सिंह यादव को तो सबसे ज्यादा गुस्सा आया संसद मे हाजीर करो.....भाई बेटा जब विरासत का राजा बन जाए तो बाप निश्चिंत हो ही जाता है सो दिल्ली की राजनीति में दिल्लगी करने लगे। और जॉर्ज साहब को वाणसैय्या पर लिटा चारणी के सहारे मुखौटा अध्यक्ष बनने वाले हमारे शीतल यादव को तो और अधिक गुस्सा आ गया। भला बताओं, चोर, डकैत, मर्डरर यह सब कहने का सर्वाधिकार तो हमारे पास सुरक्षित था उसे कोई अपनी संपत्ति बताएगा? अजी यह सब तो नेताओं ने अपने नाम पेंटेंट करा रखा है। 
चलो जो भी हुआ पर अब बच्चो को समझाने में दिक्कत नहीं होती, जैसे कि मुहावरो का अर्थ जब बनाने के लिए गोलू को दिया तो उसने यूं बनाया।
चोर की दाढ़ी में तिनका-सिसोदिया के बयान पर भड़के नेताओं ने यह बता दिया कि चोर की दाढ़ी में तिनका होता है।
चोर चोर मौसेरे भाई-अन्ना टीम पर निंदा प्रस्ताव और जनलोकपाल के मुददे पर नेताओं का साथ साथा आना।
चोर बोले जोर से- संसद में नेताओं का जनलोकपाल पर भाषण देना। जय हो जय हो, अन्त में नेताओं ने कह भी दिया कि जब जनता ही हमे चुनती है तो 
वह भी चोर है... 
हम भी चोर तुम भी चोर
अभी नहीं आएगा भोर
करते रहेगें यूं ही शोर
अन्ना लगालो जितना जोर
वन मे बस नाचेगा मोर
पैरों पर कौन करेगा गौर
यह तो है पूंजीवादियों का दौर
गांधिवादियों को कहां मिलेगा ठौर
जय हो जय हो जय हो..

22 मार्च 2012

यह मीडिया तोड़ती मरोड़ती कैसे हे जी उर्फ मैंने ऐसा तो नहीं कहा था...


अरूण साथी (व्यंग्य)

जब-तब, जहां-तहां मीडिया में बयान देने के बाद जब गर्दन फंसती है तो टका सा जबाब होता है मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर बयान को पेश कर दिया, मैंने ऐसा तो नहीं कहा था। अब कस्बे के मोहनजी चाय दुकान पर भी चुस्कीया संसद में इसी मुददे पर गर्मा गरम बहस हो रही थी। बहस में भाग लेते हुए मैने भी कुछ फेंक दिया-भैया अब जब श्रीश्री ने यह आरोप लगा दिया है कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया तो यह बात पक्की हो गई कि मीडिया, बयान को तोड़ मरोड़ देती है। हलंाकि इससे पहले मैडम, युवराज से लेकर मंत्री संत्री और धनवन्त्री तक आरोप लगा रहे थे पर कोई भरोसा ही नहीं कर रहा था! मैं तो तभी से कहूं कि यह मीडिया होती ही है बड़ी चालांक, जिस तिस के मंुह से जो सो बयान घुंसेड़ देती है और फिर रपेट रपेट कर कहने वालों को ही रपेट देती है। फिर क्या था, बेतर्क के तर्क निकलने लगी और संसद की ही तरह हो हल्ला, बेमतलक का। वह तो शुक्र है कि मैं ने तीसरी कप चाय का ऑर्डर दे दिया वरना यहां से भगाने का दुकानदार ने पूरा मन बना लिया था। 

खैर, शर्मा जी ने भी चुस्की के साथ चुप्पी तोड़ी, भैया ई बुद्धू बक्सा बाला सब बुद्धूये बनाते रहता है, सतयुग में सरसत्ती माय कैकेयी के जिह्वा पर बैठके राम को बनवास दिला दी थी और इस भठयुग में मीडिया बाला ही सरसत्ती माय बन जिह्वा पर बैठ के अंट शंट बोलवा देता है।

अब पंडित जी भी कहां चुप रहने वाले थे, सो उन्होने भी लंबा छोड़ा- अजी मैं तो कहूं ई नाराद मुनी के जात वाला पर भरोसा नहीं करे का है। इ हम सब को बुद्धिये बनाते रहता है?

अब दूध बेचने आए जादव जी से भी नहीं रहा गया, बोल दिये- तभिए तो भैया, हमर जात गोतिया के नेता सब संसद में कह रहे थे कि ई बुद्धू बक्सा को बंद होना चाहिए...। ई अन्ना नीयर आदमी के भी तोड़-मरोड़ मंत्र से ही ऐतना बड़का गो बना दिया है। सोंचना पड़ेगा भैया।

तभी पुराने कंग्रेसिया और उजर झकझक कुर्ता पहन थाना-ब्लॉक के दलाली करने वाले युगल बाबू को भी ताव आ गया, बोले-अजी हमरे पार्टी वाला नेता सब कबे से चिल्ला रहे है कि मीडिया पर लगाम लगाओ पर कोई रस्सीये नहीं देता है। तभिये तो दिग्गी बाबू को बिलेन बना दिया, अजी उनके मुंह से जो भी निकलता है सब मीडिया मंत्र से तोड़ल मरोड़ल रहता है। समझे की नहीं?
अब मैंने भी अपना अज्ञान अलाप दिया- 
जय हो, जय हो, बुद्धू बक्सा तो बेकार में बदनाम है।
इसको बुद्धू बनाना सबसे आसान काम है।
बस तोड़ने मरोड़ने का लगाना इल्जाम है।
और चौथेखंभे का काम तमाम है।।
जय हो...।

21 मार्च 2012

सरकारी स्कूलों में नक्सली पैदा होते तो श्रीश्री का ऐश्वर्य कहां से आता....

श्रीश्री रविशंकर ने जयपुर के एक समारोह में कहा कि सरकारी स्कूल नक्सली और हिंसा की फैक्ट्री है। वास्तव में (अब मैं श्रीश्री आगे नहीं लगाना चाहता) रविशंकर ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे पुंजीवाद कहा जाता है। ऐश्वर्यशाली जीवन हो तो सपने भी ऐश्वर्यशाली हो जातें है और इसी का परिचायक है रविशंकर का यह बयान। जिस सरकारी स्कूल को रविशंकर ने नक्सलवाद और हिंसा की फैक्ट्री कहा है यदि वे स्कूल नहीं होते तो सच में पुंजीवाद को आज पुंजीवाद भी कहने वाला कोई नहीं होता। उन्हीं सरकारी स्कूलों में हमारे जैसे करोड़ लोग पढ़े है और देश और समाज में सरकारी स्कूल का प्रतिनिधित्व कर रहें है। सरकारी स्कूलों की तुलना यदि हम निजि स्कूलों से करें भी तो यह हास्यास्पद हो जाता है। दरअसल यह मैकाले की शिक्षा का भी पोषक है। जिस शिक्षा के तहत हमें नौकर बनाने की फैक्ट्री में झोंक दिया जाता है और वहां से निकल कर हम संवेदनहीन बनकर महज एक मशीन बन जाते है रविशंकर भी उसी के पैरोकार बन कर सामने आए है। जब भी मैं इस तरह के किसी भी बाबा या कथित साधू को देखता हूं तो कभी मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती और उसका मूल कारण कबीर दास के इस  कथन से समझा जा सकता है।
"बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । 
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ "
 रही बात नक्सलवाद और हिंसा की, तो यह एक अलग से तर्क का व्यापक विषय है। मेरे विचार से नक्सलवाद और हिंसा एक व्यापक फलक है जिसे समझ कर ही इसे मिटाया जा सकता है। हलंाकि ओशो ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्वांत को इस आधार पर खारिज कर दिया है कि जिस अहिंसा में अपने साथ हिंसा की जाती तो वह अहिंसा कैसा? रही बात नक्सलवाद तो यह एक आंदोलन था जो रास्ते से भटक गया है और यदि सरकारी स्कूलों मंे नक्सली पैदा होते तो देश पर आज उनका ही राज होता। 
 कम से कम इतनी बुराईयों के बाद भी मैं मानता हूं कि नक्सलवाद आज भी अपने ही व्यवस्था की वजह से पनप रही है। मुझे आज भी याद है लाल सलाम फिल्म का वह डायलॉग जिसमें एक नक्सली कहता है कि जब कोई आपके मुंह में मूत दे तो क्या करेगे?
 यही सवाल सबसे बड़ा है। नक्सलवाद को यदि कुछ आपराधिक गिरोहों से अलग कर दिया जाए तो यह आज भी अपने बिमार समाज का एक लक्षण मात्र है और बिमारी को ठीक करने की जगह हम मरीज को ही मारने की बात करते है?
 जो भी हो पर रविशंकर का यह बयान आदमी के भगवान होने की अभिप्सा से उपजे अहंकार का भी परिचायक है।

19 मार्च 2012

एक छोटी सी बड़ी बात।


बड़की माई (चाची) आज अपनी पतोहू को गरिया रही थी-मुंह झौंसी, सोगपरौनी....।
मैंने पूछ लिया - की होलो बड़की माई...? 
बड़की माई का गुस्सा और भड़क गया- की बताइओ बेटा, ई मुंहझौंसी जब से अइलौ हें हमरा घर के उजारे पर पड़ल हौ, जैसे तैसे गोबर गोइठा ठोक के दो-चार रूपया जमा करो हियौ ई मंहगी के जुग में और ई एगो सलाय (माचिस) दू महिना भी नै चलाबो हौ।
काश की बड़की माई की यह आवाज देश के कर्णधार राजनेता सुन  पाते.....

17 मार्च 2012

ब्लॉगिंग, फेसबुक और मठाधीश।


ब्लॉगिंग से मन उचट रहा है पता नहीं क्यों, कुछ कुछ तो फेसबुक का असर है और कुछ कुछ मठाधीशों का। ब्लॉगिंग की दुनिया में फेसबुक की तरह आजादी नहीं है। यहां जितने ब्लॉगर है उतने मठाधीश। अपनी मर्जी। सब एक एक मठ बना कर मठाधीश बन गए है। अपने विचारों के हिसाब से ब्लॉगों का चयन करना, प्रकाशित करना सराहना....। ऐसी बात नहीं कि मेरे ब्लॉग को इन मठों में नमन करने का मौका नहीं मिलता पर यह बात मुझे अखरती रहती है और मन में एक हीनता घर कर जाती है। जब भी कोई पोस्ट छोड़ता हूं और किसी मठ में उसे जगह नहीं मिलती तो मन उदास होता है और हीनता से भर जाता है। एक तो इस आभासी दुनिया में कोई किसी का दोस्त कम ही होता है, बस टिप्पणी पाने के मतलब की यारी। इतने सालों में किसी ने मेरे या किसी और के पोस्ट पर उसकी समालोचना नहीं की। बस कुछ टाइप किए शब्द पोस्ट कर दिये जातें हैं और उम्मीद लगाई जाती है कि उन्हें भी टिप्पणी मिले।
जबसे चिठ्ठाजगत और ब्लॉगवाणी बंद हुआ है तब से कोई एक एग्रीगेटर ईमानदारी और सहुलियत से पोस्ट को प्रकाशित नहीं कर रहे। जितने ब्लॉगर है उन सब का पोस्ट एक साथ एक ही जगह पर नहीं मिलता। सभी ने तरह तरह के मापढंड बना रहे है। और तो और कहीं कहीं उन्हीं दो चार ब्लॉगरों की चलती रही है। इतने एग्रीगेटर है कि कहां कहां जा जा कर रजिस्टर हों और पोस्ट को प्रकाशित करें?
एग्रीगेटर की कमी इस तरह भी खलती है कि जिनती सुविधा जनक ढंग से फेसबुक पर टिप्पणी करने और पोस्ट पढ़ने की व्यवस्था है उतनी यहां नहीं है और इस लिए भी यहां परेशानी उठानी पड़ती है। फेसबुक पर आसानी से पोस्ट किया जा सकता है और पोस्ट करने के लिए अलग बिंडों नहीं खुलता है इतना हीं नहीं टिप्पणी करने के लिए भी अलग बिंडों नहीं खुलता और समय की बचत होती है। दोस्त बनाने की व्यवस्था भी अच्छी और इन्हीं सब कारणों से फेसबुक फेमस है। जब गूगल प्लस की लांचिंग हुई तो लगा कि एक बेहतर एग्रीगेटर मिलेगा पर वह भी असफल रहा।
कम से कम ब्लॉगिंग को बचाने के लिए कुछ ईमानदार कोशिश तो की ही जानी चाहिए और इस कोशिश मंे मठों को ध्वस्त कर देना चाहिए।

08 मार्च 2012

देह बेच देती तो कितना कमाती... महिला दिवस पर मेरी तीन पुरानी कविताऐं




महिला दिवस पर मेरी तीन पुरानी कविताऐं

1
मां का नाम क्या है? 

बचपन से ही
मां को लोग
पुकारते आ रहे हैं
‘‘रमचनदरपुरवली’’

या
सहदेवा के ‘‘कन्याय’’
बाबूजी जी भी पुकारते
बबलुआ के ‘‘माय’’
आज दादा जी ने जोर से पुकारा
अरे बबलुआ
देखा मां दौड़ी जा रही है।

उधेड़बुन में मैं सोंचता
आखिर इस सब में
मां का नाम क्या है?

जब मां गई थी ‘‘नैहर’’
तो पहली बार नानी ने पुकारा
‘‘कहां जाय छहीं शांति’’
फिर कई ने मां को इसी नाम से पुकारा..

फिर मैं
उधेड़बुन में सांेचता रहा
आखिर इस सब में
मां का नाम क्या है?
अब कई सालों से मां नैहर नहीं गई है
अब मां को शांति देवी पुकारता है
तो मां टुकुर टुकुर उसका मुंह ताकती है
शायद
मेरी तरह अब
मां भी उधेड़बुन है
आखिर इस सब में
उसका का नाम क्या है?


2
देह बेच देती तो कितना कमाती... 

यह रचना मैंने झाझा के आदिवासी ईलाके में कई दिन बिताने के बाद लिखी थी आपके लिए हाजिर है।

रोज निकलती है यहां जिन्दगी
पहाड़ों की ओट से,
चुपके से आकर भुख
फिर से दे जाती है दस्तक,
डंगरा डंगरी को खदेड़
जंगल में,
सांेचती है
पेट की बात।

ककटा लेकर हाथ में जाती है जंगल,
दोपहर तक काटती है भूख
दातुन की षक्ल में,

माथे पर जे जाती है षहर
मीलों पैदल चलकर
बेचने दंतमन,
और खरीदने को पहूंच जाते है लोग
उसकी देह.....................
वामुष्किल बचा कर देह,
कमाई बीस रूपये,
लौटती है गांव,
सोचती हुई कि अगर
देह बेच देती
तो कितना कमाती...............





3
औरत का अस्तित्व कहां..

भोर के धुंधलके में ही
बासी मुंह वह जाती है खेत
साथ में होते है
भूखे, प्यासे, नंग-धडंग बच्चे

हाथ में हंसुआ ले काटती है धान
तभी भूख से बिलखता है ‘‘आरी’’ पर लेटा बेटा
और वह मड़ियल सा सूखी छाती को बच्चे के मुंह से लगा देती है
उधर मालिक की भूखी निगाह भी इधर ही है।

भावशुन्य चेहरे से देखती है वह
उगते सूरज की ओर
न  स्वप्न
न अभिप्सा।

चिलचिलाती धूप में वह बांध कर बोझा
लाती है खलिहान
और फिर
खेत से खलिहान तक
कई जोड़ी आंखे टटोलती है
उसकी देह
वह अंदर अंदर तिलमिलाती है
निगोड़ी पेट नहीं होती तो कितना अच्छा होता।

शाम ढले आती है अपनी झोपड़ी
अब चुल्हा चौका भी करना होगा
अपनी भूख तो सह लेगी पर बच्चों का क्या।


नशे में धुत्त पति गालिंयां देता आया है
थाली परोस उससे खाने की मिन्नत करती है।

थका शरीर अब सो जाना चाहता है
अभी कहां,
एक बार फिर जलेगी वह
कामाग्नि में।

आज फिर आंखों में ही काट दी पूरी रात
तलाशती रही अपना अस्तित्व।

दूर तक निकल गई
कहीं कुछ नजर नहीं आया
कहीं बेटी मिली
कहीं बहन
कहीं पत्नी मिली
कहीं मां
औरत का अपना अस्तित्व कहां....



03 मार्च 2012

मगही पत्रिका परिवार का वार्षिकोत्सव सह बसन्तोत्सव का आयोजन। कई राज्यों कवि एवं साहित्यकार ले रहे है भाग।


मगही पत्रिका परिवार का वार्षिकोत्सव सह बसन्तोत्सव का आयोजन।
कई राज्यों कवि एवं साहित्यकार ले रहे है भाग।
बरबीघा
श्री कृष्ण रामरूचि महाविधालय, बरबीघा में मगही पत्रिका परिवार का वार्षिकोत्सव सह बसन्तोत्सव का धूूमधान से आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन डा0 दिवेश चन्द्र मिश्र द्वारा किया तथा अध्यक्षता श्री मिथिलेश द्वारा की गई। कार्यक्रम की उद्घाटन सत्र में देश एवं राज्य के विभिन्न  हिस्सों से आये मगही साहित्यकारों का परिचय एवं सम्मान किया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध मगही साहित्यकार गोपाल मिश्र को श्रद्धाजलि देते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण किया गया।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में दीनबंधु रंजीत, जयराम देवसपुरी, दयाशंकर सिंह बेधड़क जयनंदन, कृष्ण कुमार भट्ट सहित दर्जनों कवियों ने मगही कविता का पाठ कर उपस्थित श्रोताओं के मंत्रमुग्ध किया। दिनांक 3 एवं 4 मार्च को होने वाले दो दिवसीय आयोजन में मगही गध विद्या का विकास कैसे विजय पर परिचर्चा होना है।
मगही पत्रिका के सम्पादक सह प्रकाशक श्री धनंजय श्रोत्रिय ने बताया कि मगही की तीन पत्रिकाऐं मगही  बंग मागधी एवं झारखंड मागधी का प्रकाशन क्रमशः दिल्ली, कार्यकर्ता एवं रॉची से किया जा रहा है। कार्यक्रम में मगही के विकास के उपायों पर चर्चा की गई। इस अवसर पर महाविधालय के प्रधनाचार्य डा0 गजेन्द्र प्रसाद, डा0 भवेश चन्द्र पाण्डेय, अरविन्द मानव, घंमंडी राम, वीणा मिश्र आदि उपस्थित थे।
स्वागताध्यक्ष श्री उमेश देवसपुरी ने आगत साहित्यकारों का स्वागत किया।

नीमी गांव में हो रहे इस आयोजन में ग्रामीणो ंका सहयोग।


फुटवाल मैच मंे उमड़े ग्रामीण।
नालन्दा की टीम ने जमुई को हराया।
नीमी गांव में हो रहे इस आयोजन में ग्रामीणो ंका सहयोग।
बरबीघा
पन्द्रह हजार की भीड़, जीत का जुनून, ढोल-नगारे का आवाज और फुटबाल मौच का नजारा, गोल, गोल चिल्लात लोग। यह किसी सिनेमा या कि कहीं दुसरे जगह की तस्वीर नहीं बल्कि जिले के नीमी गांव मंे आयोजित शिवलोक फुटवाल टुर्नामेंट का नजारा। आज के दौर में जहां क्रिकेट का बोलबाला है वहंी नीमी गांव में यह आयोजन और इसे देखने के लिए उमड़े हजारो लोग फुटवाल की लोकप्रियता गांव में कितनी है इसकी बानगी प्रस्तुत करता है। इस टुर्नामेंट का फाइनल मुकाबला आज जमुई कें दिननगर एवं नालन्दा के उगमा टीम कंे बीच आयोजित थी जिसमें उगमा की टीम ने लगातार तीसरी बार बिजय हासिल करते हुए दिननगर की टीम को पांच शुन्य से करारी मात देकर दर्शक की बाह बाही लूटी। उगमा की ओर से मो. आशीक , शहनबाज ने गोल दोग वहीं कप्तान आशीक ने सराहनीय प्रदर्शन किया। विजेता टीम एवं उपविजेता को आयोजक यशवन्त कुमार सिंहा की ओर से सभी खिलाड़ियों को एक एक ट्रेक शूट दिया गया एवं दोनो को पुरस्कृत किया गया। आयोजक ने मौके पर घोषणा की अगले साल विजेता टीम को हीरो होण्डा मोटरसाईकिल देकर पुरस्कृत किया जाएगा। दोनो टीमों के कैपटन ने ग्रामीण दर्शकों के उत्साह और सहयोग की तारीफ करते हुए कहा कि कहीं अन्य इस तरह का नजारा देखने को नहीं मिलता है।

25 फ़रवरी 2012

भरी सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया काटजू ने।


अरूण साथी।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्केंडय काटजू ने जब बिहार मंे मीडिया आजाद नहीं कहा तो पूरे देश में नीतीश कुमार को रॉबीन हुड की तरह प्रस्तुत करने वाले मीडिया हाउस, चारणी करने वाले पत्रकारों, संपादको, बुद्धिजीवियों और बिश्लेषकों को झटका लगा। लगा जैसे किसी ने उन्हें नंगा कर आइने के सामने ला कर खड़ा कर दिया। पटना विश्वविद्यालय के प्राचार्य ने तो बाजाप्त समारोह में ही इसका विरोध किया। पर जस्टिस काटजू तब भी चुप नहीं बैठे और कहा कि इससे बेहतर स्थिति पहले की सरकार में थी, कम से कम मीडिया आजाद थी। सच क्या है। जो काटजू साहब ने कही है वह या कि कुछ और? जब इसके धरातलिय सच्चाई जाननी चाही तो वह आज के अखबर के रूप में सामने आ गई। एक मात्र राष्ट्रीय सहारा को छोड़ कर किसी दूसरे अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित नहीं करके अपनी गुलामी की बेलज घोषणा कर दी। प्रभात खबर ने दूसरे पन्ने पर इसे जगह दी है। मुख्य अखबार कहे जाने वाले दैनिक जागरण एवं दैनिक हिन्दुस्तान ने इस खबर को इस रूप में प्रकाशित किया कि पाठक दिग्भ्रमित हो जाए। अखबारों ने प्राचार्य लालकेश्वर सिंह के विरोध को प्रमुखता से प्रकाशित किया जबकि महोदय जदयू विधायक उषा सिंह के पति होकर सरकार से उपकृत है और इसकी जानकारी मीडिया के महोदयों को भी है।

बिहार का यही सच है। देहात की एक कहावत है, बाहर से फिट फाट, अंदर से मोकामा घाट। मतलब बाहर से सबकुछ बढ़िया है और अंदर से जर्जर। अखबारों में प्रति दिन छपने वाली खबरें सरकार का गुणगान करते हुए होती है जैसे कि अखबार न होकर सरकार का मुख्यपत्र हो। बिहार में कस्बाई पत्रकारों को भी पता है कि सरकार के विरोध की खबर नहीं छपनी है और इसी वजह से विपक्ष भी मन मार कर बैठ गया है।
बिहार में नौकरशाही बेलगाम है। पक्ष-विपक्ष और मीडिया नौकरशाहों पर उंगली उठाने की हिमाकत नहीं करते। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जगह कहीं नहीं है। सत्ता के मंत्रियों को घुड़की दे कर चुप करा दिया जाता है और उनपर नकेल के लिए नकचढ़े सचिव को रखा गया है।
भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रखण्ड विकास पदाधिकारी और अंचलाधिकारी जैसे गरिमामई पद पर कर्मचारी स्तरिय भ्रष्ट्र और पांच पांच बसुलने वालों को अतिपिछड़ा राजनीति के तहत प्रमोट कर बैठा कर उपकृत कर दिया गया है और खमियाजा गरीबों को भुगतनी पड़ रही है। इंदिरा आवास से लेकर जाति आवास में खुले आम धूस लिया जाता है। सेवा का अधिकार का ढीढोरा पीट दिया गया है पर सच इतर है। जिस प्रमाण पत्र को बनाने के लिए पहले 10 रू. खर्चने पड़ते थे वह अब 500 मे बिकता है। 21 दिन में प्रमाण पत्र बनाने का प्रावधान कर दिया गया है पर बनाया नहीं जाता और एक दिन मे ंबनाने का चार्ज 500, दो दिन का 300 तथा पांच दिन का चार्ज 200 निर्धारित कर दिया गया। न तो इसकी खबर छपती है और न ही कोई फर्क ही पड़ता है।
बात शिक्षा का करें तो साईकिल राशि, पोशाक राशि का वितरण ही विद्यालयों को काम रह गया है। पढ़ाई प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कॉलेज तक कहीं नहीं होती। हाजरी बनाने के लिए स्कूल को खोला जाता है फिर बंद कर दिया जाता है। मैट्रीक की परीक्षा अभी चल रही है और आलम यह कि जम कर नकल की छूट है।
गांव में गली गली बिकते शराब आने वाले दिनों में एक नए बिहार की नींब रख रही है। सड़क बन रही है पर उसपर शराब कें नशे में धुत्त चालक दर्जनों को रौंद रहा है। गांव की गलियों में फागुन की लोकप्रिय होली की जगह शराबियों का हुड़दंग दिखने को मिलता है।
सबसे बड़ा दाबा अपराध को लेकर किया जाता है पर इसका सच कुछ ईतर है और बिहार में सब काम बुद्धि से किया जा रहा है। मशलन, हत्या के केस को ओडी का केस बना कर दर्ज कर लिया जाता है। अपहरण, डकैती, बलात्कार तक का केस दर्ज करने के लिए नाको चने चबाना पड़ता है। केस ही दर्ज नहीं होगा आकड़ों का अपराध कमेगा ही।
मजदूरों का पलायान कहीं नहीं रूका है। पलायन करने वाले मजदूरों का गांव विरान नजर आएगा। दलितों के वस्तियों में इसे देखा जा सकता है। नरेगा मे लूट है। मजदूर बाहर और उनके नाम पर पैसा अंदर। विकास योजनाओ में 40 प्रतिशत कमिशन। कहां जा रहा है बिहार।
पर मीडिया में यह सब नहीं दिखता? करोड़ों के विज्ञापन का खेला है। मालिकों की तिजौरियां भरनी चाहिए। बस।

पर ऐसी बात भी नहीं की बिहार में क्रान्तिकारी पत्रकारिता मर गई है बहुत लोग है जो बिहार में मीडिया पर लगे सेंसरशीप की आग में जलते हुए तिलमिला रहे है। पर वे एक अदद नौकर होकर वेवश हो इंतजार कर रहें है। काटजू ने पटना विश्वविद्यालय के आयोजित समारोह सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया और कहीं कोई कृष्ण नजर नहीं आता।

21 जनवरी 2012

सोशल साइट्स पर प्रतिबंध के बहाने- कुछ गंदगी भी आने दो.. कब तक धर्म की आड़ में सच से मुंह छुपाते रहोगे?


(अरूण साथी)
आज सुबह ही गांव में रहने वाला एक किशोर रामशंकर साई सिंह ने अपने दोस्तों को निधि से बचने की सलाह दी है, निधि एक फेक एकाउंट है जिसपर पोर्न तस्वीरें रहती है, यह रामाशंकर के विचारों की सकारात्मक अभिव्यक्ति थी। निधि यदा कदा मेरे वाल पर भी चस्पा हो जाती है और पहले मैं उसे खोल कर देखता हूं फिर कहीं कोई मेरे वाल पर इस तरह की नंगी तस्वीर देख न ले उसे डीलीट कर देता हुं। 
सन्नी लियोन जब बिग बॉस के घर आई तो मैं भी उत्सुक हुआ और गूगल देवता की मदद से उसे ढूंढ निकाला। बाद में पता चला कि सन्नी को ढूंढना सब रिकार्ड तोड़ दिया, मैं ही नहीं कई दिवाने है, और फिर यह बहस चल रही है नैतिक की....

जब से सोशल साइटस पर प्रतिबंध की बात सुन रहा हूं तब से कुछ न कुछ पढ़ने को मिल रहा है। अभी अखबारों में प्रवचन तो कभी चैनलों पर। विचित्र दुनिया है, प्रतिबंध लगा कर सुधारने की प्रवृति अभी तक बची हुई है? भला कैद खाने में भी कोई सुधार होता है? जब से होश संभाला है तब से ही यह सुनता आ रहा हूं, यह न करा,े वह न करो, यह भला है यह बुरा? किसी ने तय ही नहीं करने दिया मुझे, भला क्या और बुरा क्या? उपदेशकों का बोल-वचन भी बड़ा ही प्यारा होता है, अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं की हम बहक जाए और धार्मिक भावनाओं का लिहाज न करें अथवा धर्म को बिगाड़ने का प्रयास करें। कुछ लोगों को राजनेताओं के उपर बने कार्टून और फेक तस्वीरों से भी आपत्ति है और फिर मामला न्यायालय में गया और आदेश आ गए प्रतिबंध लगा दो।

सबसे पहला तर्क धर्म को लेकर है। धर्म के विरूद्ध है सोशल साइट्स। तब मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है जब सोशल साइटस पर किशोर, युवा और बुजुर्ग तीन पीढ़ी एक साथ विचारों को अभिव्यक्त करतें हैं। कोई धर्म के खिलाफ लिखता है तो कोई फोटो चिपका देता है। कोई उसके उपर कॉमेंट करता है। मतलब कि यह एक ऐसा मंच जहां खुले मन से हम अपने विचार रखते है। कोई रोकने टोकने वाला नहीं। तब क्या धर्म को इन विचारों से खतरा है और वह नष्ट हो जाएगा? कैसा है यह धर्म जो इतनी छोटी सी बात से भी डर जाता है। जो कुछ पोस्ट और कार्टून से खराब हो जाएगा। हजारों सालों से हमनें जिस धर्म की आड़ में आजादी को कैद कर रखा है उस धर्म ने हमें यही सिखाया है। बड़ी लंबी चर्चा होगी यदि इस में फंसे की धर्म क्या है? बस इसी में रहते है कि क्या धर्म का आधार इतना कमजोर है कि वह नेट पर कुछ पोस्टों से खराब हो जाएगा? धर्म शाश्वत और ईश्वरीय है, तब फिर यह इतना कमजोर कैसे हो सकता है? और जिस धर्म का आधार ईश्वर है उस धर्म की चिंता हम क्यों कर रहें है? निरा बुद्धू हैं हम या फिर खुद को ईश्वर से उपर मान रहें है? छोड़ दो भाई धर्म यदि वास्तविक धर्म है तो उसे कुछ नहीं होने वाला। कहा भी जाता है कि सोने की परीक्षा आग में तपा कर ही होती है, तो तपने दो धर्म को इस आग में।

एक बात तो हमे सोंचनी ही होगी कि हजारों सालों से हम कह रहें हैं कि जमाना खराब है, हम पापी है, हमे सुधरना होगा। इसके लिए तरह तरह के प्रतिबंध लगाए, नियम बनाए, यज्ञ-प्रवचन से लेकर बुर्का तक पहना दिया और आप ही कहतें है कि वर्तमान समय सबसे बुरा है। तब धर्म और धार्मिक ग्रंथों के औचित्य के उपर ही सवाल नहीं उठाता? यदि वे सही होते तो जमाना खराब कैसे होता? और अगर जमाना खराब है तोे फिर वे सही कैसे? 

सलमान रस्दी का मामला बड़ा ही हस्यास्पद है और कई बौद्धिक मठाधीश महोदय उनके आने का विरोध कर रहें है इनमें से कुछ वही है जिन्होनें ही एम एफ हुसैन के विरोध किए जाने का विरोध किया था? कुछ मां सरस्वती की पेंटिंग मंे अश्लीलता देख लेते है तो कुछ मीड नाइट चिल्डेन के सच का सामना नहीं करना चाहते।

और अन्त में मैं उन माननीय नेताओं से कहना चाहूंगा जिन्होंने नेताओं प्रति यहां पर गुस्सा देखा है उन्हें इससे सबक लेना चाहिए न कि वहीं राजनीति की वही उलटबंसी यहां भी बजाऐं और देश का बंटाधार कर दें।
यह दोहरी जिंदगी कब तक। तय करने दिजिए सारे रास्ते इस नई पीढ़ी को, जिसे हजारों सालों से आपका धर्मिक प्रवचन, तत्वज्ञान और तालीबानी फरमान अपने हिसाब से नहीं सुधार सका। हमने कोई रास्ता बनाया ही नहीं और हजारों सालों से चिल्ला रहें है युवा रास्ते से भटक गए है!

19 जनवरी 2012

जमाना तो बोन लेस का है फिर कबाब में हड्डी क्यों बनते हो जी....(व्यंग)


अरूण साथी..

बदलते जमाने के साथ साथ जमाने का चलन भी बदल गया है। इस चलन में एक नया चलन स्याही फेंकने का जुड़ गया है वह भी उनपर जो कबाब में हड्डी बनतें है। पहले का दौर और था जब राजा महाराजा कबाब मंे हड्डी पसंद करते थे और बिरबल दरबार की शोभा बढ़ाते थे पर आज जमाना बदला है और कुछ लोग हैं कि बदलना ही नहीं चाहते। उनको यह समझ ही नहीं कि आजकल कबाब में हड्डी लोगों को पसंद नहीं और बोन लेस कबाब ऑन डिमांड है। बाबा ढावा से लेकर दिल्ली के दरबार तक बोन लेस कबाब की ही डिमांड है। अब लोग भी किसिम किसिम के है किन्हीं को शाही बोन लेस कबाब पसंद है तो किन्हीं को मुगलई बोन लेस कबाब। दोनांे कबाब के डिमांड का पता करना है तो भाई लोग युपी चुनाव पर नजर डाल लें, हां चश्मा उतार कर। आजकल शाही बोन लेस कबाब के शौकीन बड़ी संख्या में मिलने लगे है। इसकी फेहरिस्त में अपने लल्लू भैया, दीदी जी, बहन जी और तो और कामरेड भी शामील है। लोग समय समय पर जायका बदलने के लिए कभी शाही बोन लेस कबाब तो कभी मुगलई बोन लेस कबाब की डिमांड में गला फाड़ कर चिल्लाते नजर आतें है।

अब रही बात कबाब में हड्डी की तो यह अब नहीं चलेगा। देखा नहीं बाबा और बुढ़उ का का हाल हुआ। ला-हौल-बिला-कुवत। रामलीला में महाभारत करबा दी बोन लेस के शौकीनों ने। बुढ़उ को तो जंतर मंतर से लेकर आजाद मैदान तक ऐसा पोलिटिकल भूल-भुलैया में फंसाया कि बेचारे की जान पर बन आई। लोग बाग तो यही सोंचतें है, गोया जान है तो जहान है पर बुढ़उ को समझ आये तब न।
भैया, बोन लेस की बात ही निराली है। उनकी तो ठाठ ही ठाठ है। अब आपसे कुछ भी कहां छुपा है, कई लोग रीढ़ की हड्डी निकाल कर बोन लेस बने और माननीय की कुर्सी पर बिराजमान है। जय हो।

(कार्टून- गूगल देवता के सौजन्य से)


वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर अरुण साथी ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। ...