30 अप्रैल 2014

कल, आज और कल...

सुना है वह
ब्रह्म का अंश और
प्रकाण्ड विद्वान था....

और यह भी कि वह
शिव का उपासक था...

सुना तो यह भी है कि उसने
सोने का नगर बसाया...

और वह
आसमान में सीढ़ी लगा,
स्वर्ग तक
बनाना चाहता था रास्ता....

और सुना है
उसका नाम
रावण था....



28 अप्रैल 2014

भगजोगनी

(केजरीवाल को समर्पित)

अमावस की रात
धुप्प अंधेरी
हाथ को हाथ नहीं दिखता
वैसे में
एक भगजोगनी
सूरज से कम नहीं लगती....
टिमिर टिमिर जलकर
वह दिखाती है राह...
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पर जब वह
आहिस्ते से आकर
बैठती है देह पर
तो चटाक से हम उसे
कुचल देना चाहते है....

आखिर है तो वह
एक कीड़ा-मकोड़ा ही न...

17 अप्रैल 2014

रंडी.......? (आँखों देखी, बुद्धवार को थाने की एक सच्ची घटना)

उसकी आंखों में आँसू थे, खून के आँसू। लाल भभुका। चेहरे पर नफरत और गुस्से के मिले-जुले असर से चेहरा लाल-पीला था। वह  थाने में बैठी थी। उसकी उम्र बाइस साल करीब होगी और उसे दो साल की एक तथा छः माह की एक बेटी भी थी। उसका पति प्रदेश में कमाने के लिए रहता है और वह अपने ससुराल में। वह अपने पड़ोस की देवर के साथ भाग गई थी। पुलिस ने प्रेमी के पिता को उठा कर थाना में बंद कर दिया जिससे घबड़ा कर दोनों थाना में हाजिर हो गए।

उसे देखने के लिए थाना में भीड़ उमड़ पड़ी है। औरत, मरद सब। जो आ रहा है सब उसे गाली दे रहा है और हँस भी रहा है।

‘‘साली रंडी, बाप-माय के इज्जत मिट्टी में मिला देलकै।’’
‘‘ऐतनै गर्मी हलै त गुप-चुप्प करबइते रहतै हल, भागे के की जरूरत हलै।’’
‘‘ऐसन सब के काट के गांग में दहा देबे के हई।’’
‘‘बोल्हो, भतार बाहर रहतै त लंगड़े मिललै हल जेकरा अपने ठीकाना नै हय।’’
‘‘दूध्ध मुँहा बुतरू के नै देखलकै, रंडिया माय है कि कसाय।’’

जितनी मुँह उतनी बातें। वह अपराधिन की तरह थाना में बैठी थी। निर्लिप्त, निस्पृह। जैस वह पाप, पुण्य से परे हो। जैसे गाली उसे छू ही न रही हो।
उसके बाबूजी उसके बच्चे को बोतल से दूध पिला रहे हैं। तभी दरोगा जी आते है और उनके मुँहा से भी भद्दी गाली निकलती है।

‘‘जल्दी फैसला करो, बाप के साथ जाओगी तो ठीक नहीं तो यार को जेल और तुझे रिमांड होम भेज देगें। रिमांड होम में सब कुकर्म  होता है। रोज नया नया मरदाना तोरा पर चढ़तौ त मियाज ठंढा हो जाइतै।’’

तभी उसका यार आया, एक पैर से हल्का लंगड़ाता हुआ।
‘‘कहां से खिलाओगे? अपना तो ठीकाना ही नहीं है।’’
‘‘भरोसा था तभी तो ले गया।’’
‘‘तब जेल जाने को तैयार रहो।’’
‘‘सब तैयार  है, जो यह कहेगी वही करूँगा।’’
‘‘साला पासी होके बढ़ही के फँसा लेलही।’’

दरोगा साहेब ने पीटने की धमकी दी तो वह सहम गया और थोड़ा नरम पड़ते ही प्रेमिका से बोला।
‘‘अभी बाबूजी के साथ चली जाओ नहीं तो मुझे जेल भेज देगें, बाद में हमदोनों कोर्ट मैरेज कर लेगें। आवेदन तो दिया हुआ ही है।’’
वह सन्न रह गई, जैसे बिजली का नंगा तार छू लिया हो, करंट  लगा। उसने नजर उठा कर कातर भाव से सबको देखा। मुझे भी। मैंने उसे भरोसा दिया। डूबते को तिनके का सहारा।
‘‘घबराओ नहीं, तुम बालिग हो, तुम जो चाहोगी वही होगा।’’
उसके पिता भी उसे समझा रहे थे।
‘‘इहे ले पढ़ा-लिखा के बड़ा कैलियो हल। नाक कटावे? अब हमर मूडी उठतै।’’
तभी उसका पति आया। सब उसपे पिल पड़े।
‘‘कन्याय भी संभाला नहीं गया। पता नहीं है 
‘‘जर, जोरू और जमीन जोड़ के, नहीं तो किसी और के।’’
वह स्तब्ध! 

पति को देख वह भड़क उठी।
‘‘कुछछो हो, हम एकरा साथ नै जइबो।’’

खबर की औपचारिकता पूरी कर मैं चला आया। थोड़ी देर के बाद दारोगा ने बताया कि उसे पिता के साथ ही भेज दिया गया। पता नहीं क्यूं मैं उदास हो गया। सोंच रहा हँू कि किसी ने एक बार भी उससे नहीं पूछा कि तुम्हारी खुशी क्या है? समाज की इज्जत गई? बाप का नाक कटा? और सदियों से चलता आया यह नककटवा समाज एक बार फिर से प्रेम का लगा घोंट दिया और अखबारों ने संवेदनहीनता के साथ खबर छापी- ‘‘दो बच्चों की मां प्रेमी संग फरारा।’’





07 अप्रैल 2014

इंदिरा इज इंडिया के बाद हर हर मोदी का अधिनायकवादी नारा देश के लिए अशुभ।

आंदोलन के उन दिनों में जब अन्ना हजारे, अरविन्द और बाबा रामदेव अनशन कर रहे थे तो अन्ना की गिरफ्तारी, तुरंत जेल, तुरंत बाहर, रामदेव की अगुआई में चार चार मंत्री और फिर लाठी चार्ज यह कांग्रेस के नेतृत्व क्षमता की कमी दर्शाती थी। इसी प्रकार कलमांडी, कलीमोंझी और राजा सरीखों पर सरकार की शुन्यता और सुप्रिम कोर्ट के आदेश पर सबको जेल यह भी सरकार के नेतृत्व क्षमता की रूग्नता का परिचायक ही थी।
मंहगाई, भ्रष्टाचार, तेल और रसोई गौस की कीमत पर सरकार का अड़ियल रूख और मंत्रियों का अनर्गल वयानबाजी उसके जनता से कट जाने का रास्ता प्रशस्त कर दिया।
इस तरह के कई उदाहरण है। परिणामतः कल तक दंगों का आरोप झेल रहे नरेन्द्र मोदी जहां खलनायक की तरह जनता के मानसपटल पर चित्रित थे वही धीरे धीरे वे नायक बनने लगे और आज एक महानायक की तरह राजनीति के तारामंडल पर चमक रहे है।
इस सबके बीच देश के लिए कुछ धातक संकेत भी साथ साथ आ गए। इनमें से एक भाजपा का मोदीकरण हो जाना सबसे धातक है। गुजरात की राजनीति मोदी के अवतरण के बाद से हरेन पाण्डेया प्रकरण और आज आडवाणी, जोशी, टंडन, सुषमा, जेटली, नकवी तक राजनीतिक पंडितों के लिए नमो की राजनीति समझने के लिए बड़े संकेत है!
भाजपा को कार्यकत्ताओं की पार्टी मानी जाती थी पर आज राजनाथ सिंह पहले ट्विट करते है कि अबकी बार भाजपा की सरकार और फिर मिटा कर कहते है मोदी की सरकार? छद्म धर्मनिरपेक्षता और मोदी के धूर विरोधी रामविलास पासवान, रामकृपाल यादव को पार्टी ने गले से लगा लिया और बकौल नकबी आतंकी कनेक्शन के आरोपी साबीर अली को पार्टी में शामिल कर बाहर किया गया। यह सब देश की राजनीति संभालने की आतुरता के आलाबे क्या है?
वहीं देश की बड़ी पार्टी अपने पुत्र मोह में अपना सर्वनाश कर लिया। राहुल के पास राजनीतिक समझ नहीं है और उसे देश पर थोपने की जिद्द ने आज कांग्रेस को बैकफुट पर ला कर खड़ा कर दिया। परिणाम से पहले वह हारी हुई सेना सरीखी लग रही है।
कांग्रेस के इसी नेतृत्व क्षमता के आभाव के परिणामतः आज आम आदमी पार्टी का अभ्युदय हुआ। राजनीति के कई मानदंडों को तोड़ते हुए केजरीबाल ने दिल्ली की कुर्सी संभाल कर 49 दिन सरकार बना कर इस्तीफा दे दिया। भाजपा के 30 विधायक होते हुए आप के 28 विधायकों के रहने पर सरकार नहीं बनाने की बयान पर केजरीबाल को धाध नेताओं से मिलकर मीडिया ने ऐसे घेरा कि उन्होंने कांग्रेस के बिन मांगे मिले समर्थन से सरकार बना ली। आज पानी, बिजली, भ्रष्टाचार पर किए गए उनके कार्यों को भूल उन्हें फिर भगोड़ा बना दिया गया?
इस सबके बीच विकास के रथी बिहार के सीएम नितीश कुमार भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के रथ पे सवार हो गए। उनके अपने साथियों ने ही उन्हें साजिश के तहत फंसा दिया। परिणामतः आज वे आठ-दस साल पुर्व लालू यादव की राजनीतिक लीक पकड़ते हुए जातिवादी जाल बिछा दिया है। जिस तरह नरसंहार से त्रस्त स्वर्णों का गुस्सा लालू प्रसाद के उपर था उसी प्रकार आज नितीश कुमार पर है और ठीक इसके विपरार्थक मुस्लिम, पिछड़ा और दलितों का साथ उनके मिलने की संभावना है पर लालू प्रसाद से इनका मोह आज तक भंग नहीं हुआ है और नरेन्द्र मोदी ने भी यही कार्ड खेलकर राजनीति को दिलचस्प बना दिया है और लालू यादव ने स्वर्ण गरीबों को आरक्षण की बात कह राजनीति में नये संकेत दिए है।
परिणामतः बिहार के सुपरमैन नितीश कुमार की सभा में आज चप्पल और पत्थर फेंके जा रहे। भीड़ नदारद हो रही है। इस सब में सबसे दुखद यह कि दबे-कुचलों की राजनीति करने वाला वाम संगठन आज पैरों के नीचे से खिसकी जमीन को तलाश रही है। कांग्रेस का समर्थन से लेकर नंदीग्राम तक उसने कई गलतियां की जिससे आज उसकी उपस्थिति भी कहीं दिखाई नहीं देती।
आगे हर हर मोदी के अधिनायकवादी नारा देश के भविष्य की राजनीति के बुरे संकेत हैं। भय, भूख और भ्रष्टाचार से परे राम और रहीम में देश को बांट दिया गया है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग मदांध हो अपने रोजगार की चिंता छोड़, हाथों में त्रिशुल थामे घूम रहा है। मोदी यदि प्रधानमंत्री बन गए तो भारत इंदिरा इज इंडिया से आपातकाल तक के सफर को फिर से दोहरा सकता है या फिर एक नया भारत भी जन्म ले सकता है।

इस सब में सुखद यह कि केजरीबाल ने तीसरी ताकत के रूप में दो ध्रुविय राजनीति के जल में रहकर मीडिया, नेता और कॉरपोरेट रूपी मगरमच्छ से बैर मोल ले लिया है अब या तो यह मुहावरा बदलेगा या फिर से एक बार फिर सच सबित होगा, इंतजार करिए 16 मई का.....









सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...