13 जून 2017

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। उसके पीठ और सीने की हड्डी जाने कैसे, पर विचित्र तरीके से टेढ़ी मेढ़ी थी। असीम पीड़ा से जूझता एक आदमी। अष्टावक्र!

बहुत लोग उसे कुब्बड़ कहके चिढ़ाते थे। बस इसी बात पे उसे गुस्सा से जलजलाते देखा है, कई बार। और अंदर से घूँटते हुए भी...। मायूसी में कई बार कहता, "अल्लाह जाने कौन बात का सजा दिहिस है।"

सब कुछ के बाबजूद वह पढ़ाई करने में परिश्रमी था। किताबों से लगाव ही उसे मेरे करीब लगा। मेरे साथी बुक स्टॉल का कई सालों तक वही मालिक रहा। बिना किसी लोभ लाभ के।

आज अचानक उसकी याद आयी है। सुबह सुबह वह सपनों में आया। जाने कुछ कह रहा था। सुन न सका।

उससे जुड़ा एक प्रसंग है। पाक रमजान का ही महीना था और हम चार-पांच दोस्तों के साथ बाजार में टहल रहे थे।  तभी एक मित्र ने होटल के आगे उस को चिढ़ाते हुए कहा कि
"रसगुल्ला खाओगे मोनू!" वह जानता था कि मोनू रोजा में है और रसगुल्ला नहीं खायेगा!

मोनू ने भी तपाक से जवाब दिया!
"सभ्भे के भर पेट ख़िलइमहिं त खा लेबौ!"

सबको पता था कि मोनू रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि वह रोजा रखे हुए है। सभी लोग यह भी जानते थे कि जिस मित्र ने यह प्रस्ताव दिया है वह बेहद कंजूस है और वह रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। दोनों तरफ से नकारात्मक स्थिति थी फिर भी हम दोस्तों को क्या, मजा लेने के लिए कंजूस मित्र को उकसा दिया।

"मख्खीचूस तेलिया कहाँ से रसगुल्ला खिला देतै, दम है!"

"चल सबके भर पेट खिला देबौ, मोनू खाईतो तब..।"

तब मोनू भी तैयार हो गया। सभी लोग होटल में बैठे तब तक किसी को विश्वास नहीं था कि मोनू रसगुल्ला खाएगा परंतु सभी के आगे रसगुल्ला रखा गया। हंसी-मजाक होती रही। सब ठहाके लगाते रहे। सबको पक्का विश्वास था कि कोई रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि मोनू नहीं खाने वाला है। मोनू ने सबसे पहले होटल के संचालक को एडवांस पैसा देने के लिए कहा क्योंकि उसे पता था कि वह भरपेट रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। कंजूस बहुत है। खैर, इसी शर्त पर हहा-हिहहि चल रहा था और मोनू ने रसगुल्ला दबा दिया। हम सभी अवाक रह गए। फिर भी मित्रों का क्या, सब ने दबा, दबा कर रसगुल्ला दबा लिया। लंबा बिल बना। बेचारे मित्र का मुंह लटक गया। जब हम लोग खा पीकर निश्चिंत हो गए तब पूछने पर कि मोनू ऐसा क्यों किया? हम लोगों को तो उम्मीद नहीं थी। हम लोग तो मजाक कर रहे थे। कहीं गलती तो नहीं हो गई हम लोगों से। मोनू ने कहा कि

"ऐसन कोय बात नै। दोस्त के खुशी ही सबसे बड़का इबादत हई। एक दू दिन रोजा टूटे से खुदा नाराज नै होता। अउ दोस्त के खुशी से बढ़के कुछ नै होबो हैय। बाद में रोजा मेकअप करे के नियम हई।"

खैर, आर्थिक परिस्थिती ने मोनू के सारे परिवार को यहां से गया जाने पर विवश कर दिया। सभी लोग वही सेटल हो गए। कभी कभार मोनू आता, भेंट हो जाती। मिलकर भी और मोबाइल पर भी सूचित कर वह गया आने के लिए कई बार कहता पर जीवन की आपाधापी में कभी वहां नहीं जा सका। इसी बीच खबर आई कि नियोजन के माध्यम से वह शिक्षक हो गया। बाढ़ के आसपास किसी गांव में। एक दिन उसने सूचना दिया, वह शादी कर रहा है। मेरी खुशी का पारावार नहीं रहा। लगा कि ईश्वर दुख ही नहीं देते, कभी-कभी खुशी भी देते हैं। इसीलिए उनको परमपिता परमेश्वर कहा गया है। मैंने उससे कहा कि
"चल मोनू अब अल्लाह से शिकायत खत्म हो जयतौ। नयका जिनगी मुबारक।

उसने बारात में आने के लिए कहा। हम
तैयार भी हुए पर दुर्भाग्य ऐसा की बारात नहीं जा सका। जिस दिन बारात जानी थी उस दिन लगा जैसे ईश्वर अपनी नाराजगी को जाहिर करने लगे हो। इतनी मुसलाधार बारिश होने लगी, लगा कि हर जगह बादल फट पड़ेगा। धरती उसमें समा जाएगी। बादलों की गड़गड़ाहट से थर-थर धरती कांपने लगी हो। विचित्र सा माहौल था। मोबाइल पर मोनू को सूचित किया। उसने मजबूरी समझी और मायूस भी हुआ। निकाह के बाद उसने मोबाइल पर अपनी बीवी से बात भी कराया। बहुत खुशी हुई।

इसी तरह कभी-कभी मोनू से बातचीत करता रहता था। कुछ महीने बाद मैंने मोनू के मोबाइल पर कॉल किया। अचानक से उधर जिसने मोबाइल उठाई उसने मायूस होकर कहा कि मोनू का इंतकाल हो गया। शारीरिक लाचारी की वजह से उसके हृदय ने जवाब दे दी और वह चल बसा। एक मिनट के लिए सन्नाटा सा छा गया। लगा अल्लाह ने उसे थोड़ी सी खुशी बस इसलिए दी थी कि उसे ख़ुशी का एहसास हो जाए और फिर अलविदा कह कर चल दे...आह आह..

11 जून 2017

एक गोली मुझे भी मार दो...

एक गोली मुझे भी मार दो न..

(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार)
हरिया। यही मेरा नाम है। किसान हूँ, अक्सर किसानों का यही नाम होता है । जब से सरकार ने गोली मारने के बाद एक करोड़ मुआवजा देने का ऐलान किया है तभी से सोच रहा हूं क्यों ना मैं भी मर ही जाऊं। परेशानी यह है कि गोली सरकारी होगी तभी तो एक करोड़ का मुआवजा मिलेगा क्योंकि आत्महत्या करने के बाद कर्ज माफी तक नहीं होती।

खैर, कोशिश करके देखता हूं। हां, इसके लिए कुछ आवश्यक चीजें जरूरी है। जैसे कि किसी विपक्ष के नेता का सहयोग और समर्थन, जो कुछ लोगों को जुटाकर उग्रता कराए और इसी बीच पुलिस गोली चला दे जिसमें मैं मारा जाऊं या फिर मीडिया का समर्थन जो मेरे दर्द को दिखाएं कम, चिल्लाये ज्यादा और पूरे देश में हाय तौबा मच जाए। क्योंकि मरता तो मैं रोज ही हूं पर तब हंगामा नहीं मचता। बिपक्षी नेता और सपक्षी मीडिया खामोश रहती है। सौ रुपये का अनाज उपजा कर अस्सी में बेचना मरने से कम है क्या? पानी, दवा के लिए तिल तिल कर मरना, मरने से कम है क्या? पर एक पैसे का मुआवजा कहां कभी मिलता है। और सोशल मीडिया की तो पूछो मत साहब। शास्त्रों, पुराणों में जिस स्वर्ग की बात कही गयी है वह यही तो है। एक से एक संत महात्मा, छोड़िये। भटके हुए के साथ फालतू में भटकना कैसा।

इसी बीच कभी कभी सोचता हूं कि एक सरकारी गोली खाकर मर भी जाऊं तो एक करोड़ कितना होता है मुझे कहां पता! तीन जीरो या चार जीरो से अधिक पैसे नहीं देखे है इसलिए कितना होगा क्या पता! शायद दो तीन बक्से में आ जाए। अरे, उसे रखूंगा कहाँ! यही परेशानी हो जाएगी। फिर अचानक यह भी सोचने लगा, चलो मान लिया कि सरकार की गोली लगी, तुरंत मर गया तो एक करोड़ मिल जाएगा। बाल-बच्चों के जीवन बन जाएंगे। शायद एक करोड़ में दो-तीन पीढ़ी आराम से काट ले पर इतने पैसे मिलने के बाद मेरे बच्चे किसान भी तो नहीं रहेंगे! वह खेती छोड़ देंगे! अनाज उपजायेगा कौन? लोगों को खिलाएगा कौन? अरे किसान रहकर तिल तिल क्यों मरना। बात खत्म करो। एक बार सरकारी गोली से मारो। सात पुस्तों को धनवान करो। चिंता छोड़ो, सुख से जिओ।

अरे सुना है सरकार हमारी मौत पे एक दिन का उपवास भी करेगी। आह! सुखद! सौभाग्य! यहां तो सालों उपवास करता हूँ तो कोई पूछता नहीं।

अच्छा, ऐसा हो सकता है, क्यों नहीं, हां क्यों नहीं होगा। सरकारी गोली खाओ आंदोलन पूरे देश में चले। हम सब किसान सरकार से कहें कि हमें गोली मार दो। गोली मारने के बाद एक करोड़ का मुआवजा तो मिल ही जाएगा! हाड़ तोड़ मेहनत, खून पसीना बहाकर, खेतों में हल चलाकर, मजदूरी करके हजार नहीं जुटा पाते तो एक गोली खाकर करोड़ों मिले तो
कौन नहीं मरना चाहेगा...चलो, चलो हमसब मरते है...हम सब किसान सरकारी गोली खाकर मरने के लिए तैयार है...आप मुआवजा देने के लिए तैयार रहो, सरकार बहादुर...एक गोली मुझे भी मार दो...



07 जून 2017

किसान हो, औकात में रहे..

किसान हो, औकात में रहो
देखते नहीं हो
तुम्हारी सरकार
तुम्हारे लिए कितना
कुछ कर रही है

योजनायों का पहाड़ है
फसल बीमा से लेकर
तुम्हारी आत्महत्या के लिए

बड़ी बड़ी कंपनियों का
बीज है
उर्वरक है
प्रचार पे अरबों खर्च है
भाषण है
मन की बात है
और क्या चाहिए..

तुम अन्न उपजाते हो
पराक्रम दिखाते हो
आधी रोटी खा सो जाते हो

फिर क्यों रोटी के लिए
सड़क पे आते हो
क्यों सरकार बहादुर के आगे
रोटी रोटी चिल्लाते हो..

आओ, फाइलों में देखो
और
सरकारी
योजनाओं का लाभ
उठाओ,

आत्महत्या कर आओ
एक लाख लेकर जाओ
या
प्रदर्शन में
सरकार की गोली खाकर
मारे जाओ
दस लाख नकद पाओ

बिकल्प तुम चुनो..
किसान हो
यथार्थवादी बनो
सपने मत बुनो
भगवान मत बनो

किसान हो, औकात में रहे...


सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...